समाज के लिए आज भी अभिशाप है ‘ऑनर किलिंग’

आनंद कुमार 

‘ऑनर किलिंग’ किसी तथाकथित गौरव के लिए की गई वो हत्याएं हैं जिसका सामना ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है। इनकी पहचान कर पाना बहुत मुश्किल काम होता है, क्योंकि कई बार संपत्ति के मामलों में भी हत्याएं ऐसे ही बहाने बना कर की जाती हैं इसलिए अगर किसी समाज में इनकी गिनती ढूँढने की कोशिश करें को मुश्किल होगी। कई बार परिवार इन्हें आत्महत्या और दुर्घटनाओं के रूप में भी प्रस्तुत करने में सफ़ल हो जाता है। हालाँकि एशिया महाद्वीप, खास तौर पर मध्य पूर्व और दक्षिण एशिया के समाज में ऐसी घटनाएँ ज्यादा देखने में आती हैं लेकिन दुनियाँ के लगभग हर कोने में ऐसी घटनाएँ होती हैं । संयुक्त राष्ट्र का मानना है की करीब पांच हज़ार महिलाएं हर साल इन गौरव के लिए की गई हत्याओं की शिकार होती हैं। बीबीसी बताती है, ‘नारीवादी संगठनओं का मानना हैं की दुनिया भर में लगभग बीस हज़ार महिलाएं ऐसे हमलों का शिकार होती हैं ।” हत्या इस तरह के अपराध का सिर्फ एक रूप है । इनके अलावा महिलाओं को लगभग ऐसे ही कारणों के लिए एसिड हमलों, अपहरण, अंग भंग, पिटाई जैसी चीज़ों का सामना करना पड़ता है । UK (ब्रिटेन) की पुलिस ने साल 2010 में इस तरह के 2,823 मामले दर्ज़ किये थे। कुछ घटनाओं में जब भीड़ पीट पीट के किसी को मार देती है तो सबसे पहले याद आता है की क्या ये जायज तरीका था? ज्यादातर लोगों के लिए इसका जवाब नहीं ही होगा। कानून अपने हाथ में लेना कहीं से भी सही नहीं हो सकता। गया, बिहार में जब ऐसी ही घटना सुनाई दी तो मेरी पहली प्रतिक्रिया थी की हे भगवान अब बिहार में भी ‘ऑनर किलिंग’ हम तो ऐसे ना थे ! दिन बीतता गया और जैसे ही घटनाएँ खुल कर सामने आईं तो पता चला की ये तो कुछ और ही था ।

हत्या इस तरह के अपराध का सिर्फ एक रूप है । इनके अलावा महिलाओं को लगभग ऐसे ही कारणों के लिए एसिड हमलों, अपहरण, अंग भंग, पिटाई जैसी चीज़ों का सामना करना पड़ता है । UK (ब्रिटेन) की पुलिस ने साल 2010 में इस तरह के 2,823 मामले दर्ज़ किये थे। कुछ घटनाओं में जब भीड़ पीट पीट के किसी को मार देती है तो सबसे पहले याद आता है की क्या ये जायज तरीका था? ज्यादातर लोगों के लिए इसका जवाब नहीं ही होगा। कानून अपने हाथ में लेना कहीं से भी सही नहीं हो सकता।

जयराम मांझी करीब 38 साल के थे, कासाडीह गाँव के थे और पड़ोस के ही अमेठा गाँव में उनकी शादी हुई थी। उनके तीन बच्चे थे। अक्सर अपनी ससुराल आते जाते उनकी मुलाकात वहीँ पड़ोस में रहने वाली लड़की से हुई। सोलह वर्षीय लड़की को इनसे प्यार हो गया और दोनों एक दिन भाग निकले। माना जा रहा है की दोनों को पड़ोस के पहाड़पुर गाँव से पकड़कर लड़की के परिवार वाले ले आये। पंचायत ने दोनों को मौत की सज़ा सुना दी। फ़िलहाल दोनों भागने वाले मृत हैं, लड़की की चाची पुलिस की हिरासत में हैं और हमारे सामने है कई सवाल। मामला घर से भागने तक पहुँच गया और लड़की को किसी ने समझाया नहीं की दस साल में जब वो छब्बीस साल की होगी तब वो आदमी पचास का बुड्ढा होगा? उसके पहले से तीन बच्चे हैं और बीवी भी है, जो आज उन्हें छोड़ कर भाग रहा है वो कल तुम्हें भी छोड़ सकता है? लड़की का परिवार से कोई संवाद ही नहीं था क्या ? 38 वर्ष के एक विवाहित व्यक्ति को नैतिकता क्यों नहीं याद आई किसी बिटिया की उम्र की लड़की पर फिसलते समय? कैसा समाज है जहाँ से ऐसी नैतिकता भी गायब होती जा रही है? और समाज जिसने इन दोनों तथाकथित अपराधियों को दण्डित कर दिया वो जयराम मांझी की पत्नी और उन तीन बच्चों का क्या करेगा? एमनेस्टी इंटरनेशनल का वक्तव्य है की “गौरव अतुल्य है और क्षमा की कोई गुन्जायिश नहीं होती है। जिन महिलाओं पर शक की सुई घूमती है उन्हें अपने बचाव का कोई मौका नहीं मिलता। परिवार के पुरुषों पर सामाजिक प्रतिष्ठा वापिस पाने का एक ही तरीका होता है, उन औरतों पर हमला।” सामाजिक ताने बाने के हिसाब से ऐसा माना जाता है की ये परम्पराएँ उन समुदायों में शुरू हुई जहाँ लोग घुमक्कड़ थे। उनकी सारी जमा पूँजी उनके साथ ही होती थी और लड़की के भागने पर अक्सर सारी जमा पूँजी जाने का खतरा रहता था। ऐसे समाज में न्याय व्यवस्था के लिए किसी अदालत पर निर्भर रहना भी संभव नहीं था। प्रतिष्ठा अर्जित करना जहाँ पुरुषों का काम था वहीँ महिलाएं केवल इसे नष्ट कर सकती थीं। आज के समाज में इसके तरीके भी बदले हैं। अक्सर हत्या करने वाला परिवार का सबसे छोटा सदस्य होता है। एक तो इस से बचपन में ही सामाजिक गौरव की एक विकृत मनोभावना बनाने में मदद मिलती है दुसरे इस से कभी पकड़े जाने पर बच्चे के कम उम्र होने का दावा कर के सजा भी कम करवाई जा सकती है।

फ़रीना आलम जो की एक मुस्लिम पत्रिका की संपादक हैं उनका कहना है की ब्रिटेन में ये प्रवासियों के समुदाय की आम समस्या है। प्रवासी अपने रिश्तेदारों और अपने वतन के संस्कारों से बंधे रहना चाहते हैं क्योंकि ये एक सामाजिक सुरक्षा का एहसास देता है। उनके वतन के गाँव में पुरुषों का वर्चस्व कहीं ज्यादा था। नए शहर में आकर उनका ये नियंत्रण खो गया है। परिवार के सदस्य किसके साथ उठें बैठें, किस से बात करें, किसके साथ काम करें उसपर नियंत्रण नहीं रह गया है। ऐसे में वापिस वर्चस्व स्थापित करने के लिए अक्सर हिंसा का सहारा लिया जाता है ।

पारिवारिक गौरव के लिए की गई ऐसी हत्याओं की कई वजहें हो सकती हैं :

  1. तय की गई शादी से इनकार करना
  2. तलाक माँगना (आतताई किस्म का व्यवहार सहने के बाद भी अगर महिला तलाक लेना चाहे )
  3. सदस्य के चरित्र पर किसी किस्म का आक्षेप या कोई अफ़वाह
  4. बलात्कार पीड़ित (कुंवारी होना कई समुदायों में स्त्री के चरित्र की पहचान है, ऐसे में बलात्कार पीड़ित को परिवार के लिए शर्मिंदगी की वजह माना जाता है ।)
  5. समलैंगिकता (नए माहौल में आज कल समलैंगिकता भी इसकी एक वजह होने लगी है ।)

जबरन दबाव बना कर शादी करवाने के मामले भी शामिल हैं इसमें और आत्महत्या के लिए उकसाने के तरीके भी दिखते हैं ।

ऐसे में जब इन हत्याओं की चर्चा शुरू होते ही इन्हें हिन्दू या मुस्लिम समुदाय से जोड़ा जाता है तो पुरुषों के वर्चस्व को कायम रखने के लिए बहस की दिशा को मोड़ने की कोशिश दिखाई देती है। दरअसल ये आधी दुनिया को दबाने कुचलने के लिए जारी हिंसा के कई रूपों में से एक है। जरुरत है कानून की परिभाषाएं बदली जाएँ। इनमे ऐसे मामलों की अलग परिभाषा हो और इनके लिए कड़ी सजाओं का विधान भी हो। जबतक इनपर समाजसेवकों, जन प्रतिनिधियों और विशेष तौर पर स्त्रियों का ध्यान नहीं जाता, इस समस्या का समाधान मुश्किल है। समय के साथ बदल चुकी सामाजिक व्यवस्था में समाज के सोच में बदलाव की जरुरत है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)