मोदी सरकार के मजबूत नेतृत्व में चीन को पछाड़ सफलता की नई इबारत लिखेगा भारत!

चीन ने जिस तरह से अमेरिका के राष्ट्रपति ओबामा का अपमानजनक स्वागत किया है उससे एक बात साफ़ है कि चीन आगे के समय में अमेरिका को इसी तरह की झिड़कियां देता रहेगा। अमेरिका, चीन की निगाह में उसकी राह का रोड़ा है और उसे एशिया में अमेरिका द्वारा भारत को मिलाकर, उसके प्रभुत्व को चुनौती देना बिलकुल भी रास नही आ रहा है।

कहना गलत नहीं होगा कि नये भारत का आत्मविश्वास, अमेरिका की टूटती साख, चीन की अपने प्रभुत्व मनवाने की जिद और योरोप व मध्यपूर्व एशिया में कट्टर इस्लामिक शक्तियों का प्रहार, वह सब कारण होंगे जो विश्व को 2020 के बाद एक लंबे समय तक, उथल पुथल के युग में ले जाएंगे। हालांकि इन सबके बावजूद भारत के मौजूदा मजबूत नेतृत्व और उसकी सुस्पष्ट नीतियों के कारण भारत की स्थिति शानदार ढंग से प्रगतिशील बनी रहेगी। यानी आने वाला दशक निश्चित रूप से भारत का होगा।

वैसे तो चीन और अमेरिका के संबन्ध हमेशा से ही अमेरिकी जरुरत पर आधारित रहे है और इसका फायदा चीन ने भरपूर उठाया भी है। आज जो चीन है, वह अमेरिकी पूंजी की बदौलत है। अर्धशताब्दी पूर्व तो चीन और अमेरिका में कोई संबन्ध ही नही थे, लेकिन 1970 में, जब अमेरिका के तत्कालीन सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट हेनरी किसिंगर ने सोयिवत रूस को घेरने के लिए चीन से दोस्ती का हाथ बढ़ाया तब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन खुद ही चीन पहुंचे थे और गर्मजोशी से माओ से मिले थे। आज समय बदल गया है, आज 46 साल बाद, अमेरिका के लिए चीन एक प्रतिद्वंदी बन गया है। एक वह वक्त था जब 1970 में अमेरिका ने चीन से दोस्ती करने के लिए पाकिस्तान की सहायता ली थी और आज वो वक्त आगया है कि पाकिस्तान ही, अमेरिका के एजेंडे से गायब हो गया है।

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आगे आने वाले समय में चीन, अमेरिका, जापान, फिलीपींस, ताइवान और वियतनाम के हितों को चोट पहुचाते हुए, दक्षिण चीनी महासागर में अपनी गतिविधियों को तेज़ करेगा और साथ में, अमेरिका के साथ गठजोड़ करने की सज़ा के तौर पर जहाँ पाकिस्तान को समर्थन बढ़ायेगा वही भारत की सीमा पर विवाद भी खड़ा करेगा। लेकिन इस सबको लेकर फ़िलहाल अभी कोई युद्ध नहीं होने वाला है। अभी तो कुछ समय तक चीन और भारत के बीच सिर्फ, तू डाल डाल मैं पात पात के तर्ज पर कूटनैतिक शोशे बाज़ी ही चलती रहेगी।

इन दो बड़े एशियाई राष्ट्रों के बीच हो रहे इस शह और मात का खेल, विश्व में अमेरिकी प्रभाव के पराभव की पटकथा भी लिखेगी। ओबामा के अस्ताचल में जाने के बाद, अमेरिका के भविष्य के राष्ट्रपति चाहे वह हिलेरी हो या ट्रम्प, दोनों ही अमेरिका को नीचे ले जायेंगे और भारत, अमेरिका की कीमत पर, अपने प्रभाव को दक्षिण एशिया से लेकर सदूर पूर्वी एशिया तक फैलायेगा। आगे के वर्षो में चीन की विस्तारवादी नीति और हठधर्मिता अभी बलूचिस्तान तथा दक्षिण चीनी महासागर में और अशांति को जन्म देगी और इसमें भारत सिर्फ प्रत्यक्षदर्शी की भूमिका निभाने की कोशिश करेगा। भारत, अभी चीन से सीधे सीधे टकराव से बचने की कोशिश करेगा और उसको उलझा कर उसके आर्थिक विकास की गति को धीमी करने के कूटनीतिक प्रयास में ही लगा रहेगा।

ऐसा नही है कि चीन को इन सब बातों का एहसास नही है, लेकिन वह जहाँ भारत के नए नेतृत्व की स्थापित परिपाटियों को तोड़ने की क्षमता से असमंजस में है, वहीं भारत की नई विदेश नीति और सामरिक महत्वाकांक्षा के आकलन में चूक कर चुका है। कहना गलत नहीं होगा कि नये भारत का आत्मविश्वास, अमेरिका की टूटती साख, चीन की अपने प्रभुत्व मनवाने की जिद और योरोप व मध्यपूर्व एशिया में कट्टर इस्लामिक शक्तियों का प्रहार, वह सब कारण होंगे जो विश्व को 2020 के बाद एक लंबे समय तक, उथल पुथल के युग में ले जाएंगे। हालांकि इन सबके बावजूद भारत के मौजूदा मजबूत नेतृत्व और उसकी सुस्पष्ट नीतियों के कारण भारत की स्थिति शानदार ढंग से प्रगतिशील बनी रहेगी। यानी आने वाला दशक भारत का होगा।

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)