लोक मंथन : परंपरा और जीवन-शैली का हमारे चिंतन पर पड़ता है प्रभाव

भारतीय संस्कृति का दर्शन और अवधारणा हमेशा से ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की रही है। सदियों से हम इसी परंपरा का निर्वाह करते आ रहे। इसी भावना ने हमें अस्त-व्यस्त भी किया, लेकिन हमारी भावना गलत नहीं थी। इसलिए हजारों आक्रमणों को झेलने के बाद भी हम चट्टान की तरह खड़े हैं। लोकमंथन का दूसरा दिन भी इसी के इर्द-गिर्द रहा, जहां भारतीयता से लेकर आधुनिकता और बाजारवाद सभी विषयों पर वृहद चर्चा की गयी। दूसरे दिन प्रथम सत्र के अपने संबोधन में नीति आयोग के सदस्य विवेक देबराय की बातों में अर्थ-चिंतन से ज्यादा भारतीय दर्शन की झलक दिखी। श्री देबराय ने स्वामी विवेकानंद को कोट करते हुए कहा कि ‘हे भारत तू मेरा है, मैं तेरा हूं, भारतीय समाज मेरा है, भारतीय समाज की उन्नति मेरी उन्नति है, अवनति मेरी अवनति है। सच्चे अर्थों मंे यही राष्ट्रीयता है। मैं किसी भी जाति अथवा समाज का हूं मेरी कोई भी भाषा है, लेकिन मैं भारतीय हूँ। भारत की अधिकांश जनता मोक्ष पर विश्वास करती है, सत्चित्त पर भरोसा करती है, यदि मुझे भारत पर गर्व नहीं है तो इसका अर्थ है कि मुझे भारत पर भी गर्व नहीं है’’।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि ‘पश्चिम को बाजार चाहिए और भारत को बाजार और परिवार दोनो चाहिए, नीति आयोग को नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि आयोग में अर्थ तो है, लेकिन संस्कृति नहीं है, आयोग के कामकाज में भी भारतीय संस्कृति का समावेश होना चाहिए। दुनिया भर के लोगों में बढ़ती अशांति और तनाव को चिंहित करते हुए श्री जोशी ने कहा कि ‘दुनिया ने समृद्धि देख ली है, अब लोग शांति चाहते हैं, इसके लिए नयी व्यवस्था की तालाश होनी चाहिए।’

भारत हमेशा से संयुक्त परिवार का हिमायती रहा है, हमारी संस्कृति के विकास में संयुक्त पररिवार की अहम भूमिका है। सम्मान और संस्कृति का संरक्षण संयुक्त परिवार में ज्यादा होता है और बच्चों के अंदर संस्कार का पहला बीजारोपण भी यहीं होता है। संयुक्त परिवार से समाज संस्कारित होता है और संयुक्त विश्व अर्थात ग्लोबल फैमिली से पूरी मानव सभ्यता संस्कारित होती। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि ‘पश्चिम को बाजार चाहिए और भारत को बाजार और परिवार दोनो चाहिए, नीति आयोग को नसीहत देते हुए उन्होंने कहा कि आयोग में अर्थ तो है, लेकिन संस्कृति नहीं है, आयोग के कामकाज में भी भारतीय संस्कृति का समावेश होना चाहिए। दुनिया भर के लोगों में बढ़ती अशांति और तनाव को चिंहित करते हुए श्री जोशी ने कहा कि ‘दुनिया ने समृद्धि देख ली है, अब लोग शांति चाहते हैं, इसके लिए नयी व्यवस्था की तालाश होनी चाहिए।’

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मंथन की सार्थकता तभी सिद्ध होती है जब इसमें सभी पक्षों को शामिल किया जाए। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता कर रही केन्द्रीय मंत्री स्मृति इरानी ने इस बात का जिक्र करते हुए कहा कि मंथन में देवताओं के साथ असुर भी हों, तभी अमृत निकलेगा। अकेले देवताओं के बीच विचार मंथन से क्या होगा ? और यही भारतीय संस्कृति की अवधारणा भी रही है। बिना असुरों को साथ लिए समुद्र का मंथन संभव नहीं हुआ। जहां सभी के विचारों और भावनाओं का सम्मान हो उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है और आधुनिकता भी यहीं से उत्पन्न होती है। आधुनिकता कोई मनोरोग नहीं है, ना ही यह किसी प्रकार का विभेद पैदा करता है, हां पूरब और पश्चिम के आधुनिकता की अवधारणा में अंतर जरूर है। इसी को परिभाषित करते हुए श्रीमती इरानी ने कहा कि उसी प्रकार वेष-भूषा, भाषा और जीवन शैली को आधुनिकता नहीं कहा जा सकता है, पाश्चात्य विचारों में शक्ति, सफलता एवं धन-संग्रह पर जोर एवं उपभोग-प्रतिस्पर्धा पर फोकस करता है। भारतीय परंपरा के केन्द्र बिंदु में परिवार, सम्मान और सहयोग है। सबके विचार और मान्यताओं को समाज स्वीकार करे यही आधुनिकता है।

भारतीय समाज प्रारंभ से ग्राह्य रही है, यहां सभी विचारों को मान्यता मिली है और भारतीय सभ्यता तो अनादिकाल से आधुनिकता से साक्षात्कार करती है। इस विषय पर प्रकाश डालते हुए डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी शोध अधिष्ठान के निदेशक डाॅ. अनिर्बान गांगुली ने कहा कि परंपरा और जीवनशैली हमारे चिंतन को प्रभावित करती है। अंग्रजी शिक्षा प्रणाली ने हमारे भीतर इच्छा और महत्वाकांक्षा को जगाया। इससे एक राजनीतिक प्रभुत्व बनता है, जिससे हमारी परंपरा क्षतिग्रस्त होती है और हमारी विश्वदृष्टि जड़विहिन हो जाती है। आधुनिकता का अर्थ पाश्चात्यकरण नहीं होता है, यह बात पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में ही कह दिया था। चर्चा को आगे बढ़ाते हुए श्री गांगुली ने कहा कि ‘महर्षि अरविंद भी इस बात को बडे़ प्रमुखता से मानते हैं। वह कहा करते थे कि किसी भी बाहरी विचार को हमें स्वीकार करना चाहिए, परंतु अपनी शर्तों पर। स्वामी विवेकानंद ने भी आधुनिकता को समयानुकूल परिभाषित किया था। अतः आधुनिकता से परहेज करना गलत है, परहेज आधुनिकता से पड़ने वाले दुष्प्रभाव से करना चाहिए।

(लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च एसोसिएट हैं।)