जानिये क्यों ऐतिहासिक है प्रधानमंत्री मोदी का अमेरिकी संसद में दिया गया भाषण

सिद्धार्थ सिंह

भारत और अमेरिका का इतिहास, संस्कृति एवं आस्थाएं भले ही अलग-अलग हों लेकिन दोनों देशों के लोकतंत्र में नागरिकों की अटूट आस्था और अभिव्यक्ति की आजादी की स्वतंत्रता, एक समान हैं। सभी नागरिक के एक सामान अधिकार हैं, यह विचार भले ही अमेरिकी संविधान का केन्द्रीय (मुख्य) आधार हो, लेकिन भारत में संविधान के संस्थापक आंबेडकर भी इसी विश्वास को साझा करते थे और वे भारत के प्रत्येक नागरिक की व्यक्तिगत आजादी चाहते थे। प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका के संसद में दिए भाषण में यह स्पष्ट कहा की उनकी सरकार के लिए संविधान पवित्र ग्रंथ है और उस पवित्र ग्रंथ में किसी की चाहे जैसी भी पृष्‍ठभूमि रही हो, सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार व अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता, मताधिकार, और समानता के अधिकार को मौलिक अधिकारों के रूप में प्रतिस्‍थापित किया गया है। दोनों ही देशों में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाओं के बीच भागीदारी उस प्रकार से दृष्टिगोचर होती रही है जिसमें दोनों देशो के कई चिंतकों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया है और हमारे समाजों की धाराओं को आकार दिया है। श्री मोदी ने कहा की नागरिक असहयोग के श्री थोरोस के विचार ने भारत के राजनीतिक विचारों को प्रभावित किया है ठीक उसी प्रकार, भारत के महान संत स्‍वामी विवेकानंद द्वारा मानवता को अंगीकार करने का सर्वाधिक विख्‍यात आह्वान शिकागो में ही किया गया था।

प्रधानमंत्री के द्वारा अमेरिका की संसद में दिया गया यह भाषण भविष्य में एक ऐतिहासिक घटना के रूप में याद रखा जायेगा क्योंकि पूरे भाषण के दौरान 66 बार अमेरिकी सांसदों ने तालियों की गडगडाहट के साथ मोदी जी के शब्दों को अपना समर्थन दिया और उसमे भी 9 बार तो खड़े होकर सभी सांसदों ने उनके द्वारा कही गयी बात पर तालिया बजायीं। अपने इस उद्बोधन में प्रधानमंत्री ने सिर्फ अपने विचार ही नहीं रखे अपितु यह भी बताया की आने वाले दशकों में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध किस मार्ग पर और किस गति से आगे बढ़ेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री का यह भाषण कई मायनों में ऐतिहासिक है।

गांधी जी के अहिंसा के सिद्धांत ने मार्टिन लूथर के साहस को प्रेरित किया। प्रधानमंत्री मोदी ने आने भाषण मेंबाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का भी उल्लेख किया और कहा कि डॉ। बी आर आंबेडकर की प्रतिभा का परिपोषण एक सदी पहले उन वर्षों में ही किया गया था, जो उन्‍होंने कोलम्बिया यूनिवर्सिटी में व्‍यतीत किए थे तथा उन पर अमेरिकी संविधान का प्रभाव, लगभग तीन दशक बाद, भारतीय संविधान के आलेखन में प्रतिबिम्बित हुआ।

pic 2 in article

भाषण के दौरान हँसी व मजाक का माहौल तब बना जब मोदी ने अमेरिका के संसद की कार्यवाही की तुलना भारत की संसंद से की। मोदी ने कहा की, “अमेरिकी कांग्रेस का काम करने का तरीका बेहद सद्भावपूर्ण है। मुझे ये भी बताया गया कि आप लोग अपने द्विदलिय व्यवस्था के लिए जाने जाते हैं। इस तरह की व्यवस्था को मानने वाले आप लोग अकेले नहीं हैं। पहले भी और आज भी मैंने देखा है कि हमारे भारतीय संसद में भी इसी तरह का उत्साह रहता है। सतौर से ऊपरी सदन में हमारी परंपराएं काफी मिलती-जुलती हैं”।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने उद्बोधन में योग का उल्लेख करते हुआ कहा की दोनों देशों के लोगों के बीच बेहद करीबी सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। भारत की प्राचीन धरोहर योगा का अमेरिका में 30 मिलियन लोग अभ्यास कर रहे हैं और भारत ने योगा पर कोई प्रज्ञात्मक संपत्ति अधिकार भी नहीं लगाया है।

अमेरिका में बसे भारतीय मूल के लोगो का अमेरिका की प्रगति में योगदान का उल्लेख करते हुए श्री मोदी ने कहा की “हमारे 30 लाख भारतीय अमेरिकी दोनों देशों को जोड़ने के लिए एक अद्वितिय और सक्रिय सेतु का काम करते हैं। आज वो अमेरिका के बेहतरीन सीईओ, शिक्षाविद, अंतरिक्षयात्री, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, चिकित्सक और यहां तक की अंग्रेजी वर्तनी की प्रतियोगिता के चैंपियन भी हैं। ये लोग आपकी ताकत हैं। ये लोग भारत की शान भी हैं। ये लोग हमारे दोनों समाजों के प्रतिनिधि की तरह हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में अपने कुछ और विचारों को भी रखा और गुजारिश की के उन आर अमेरिका के लोग भी ध्यान दें जैसे की उन्होंने कहा की हमें समाज में सिर्फ धन-दौलत और संपदा न बनाकर नैतिक मूल्यों का भी निर्माण करना चाहिए। हमें सिर्फ तात्कालिक लाभ के लिए कार्य नहीं करना बल्कि दीर्घकालिक फायदों के लिए भी विचार करना चाहिए, हमें न सिर्फ अच्छी कार्य प्रणाली के लिए काम करना है बल्कि साझेदारी को बढ़ाने पर भी विचार करना चाहिए। हमें न सिर्फ हमारे लोगों के अच्छे भविष्य़ के लिए सोचना चाहिए बल्कि हमें अधिक संयुक्त, एकजुट मानवीय और समृद्ध विश्व के सेतु के रूप में कार्य करना चाहिए, और हमारी नई साझेदारी की सफलता के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि हम इसे एक नए दृष्टिकोण और संवेदना से देखें, ऐसा करने से हम इस असाधारण रिश्ते के वादों को महसूस कर सकेंगें।

प्रधानमंत्री के द्वारा अमेरिका की संसद में दिया गया यह भाषण भविष्य में एक ऐतिहासिक घटना के रूप में याद रखा जायेगा क्योंकि पूरे भाषण के दौरान 66 बार अमेरिकी सांसदों ने तालियों की गडगडाहट के साथ मोदी जी के शब्दों को अपना समर्थन दिया और उसमे भी 9 बार तो खड़े होकर सभी सांसदों ने उनके द्वारा कही गयी बात पर तालिया बजायीं। अपने इस उद्बोधन में प्रधानमंत्री ने सिर्फ अपने विचार ही नहीं रखे अपितु यह भी बताया की आने वाले दशकों में भारत और अमेरिका के सम्बन्ध किस मार्ग पर और किस गति से आगे बढ़ेंगे। इसलिए प्रधानमंत्री का यह भाषण कई मायनों में ऐतिहासिक है।

(सिद्धार्थ सिंह जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्र हैं)