यूपी चुनाव : भाजपा के पक्ष में दिख रही लोकसभा चुनाव जैसी लहर

संभवतः इस सप्ताह चुनाव आयोग उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दे। सभी पार्टियाँ पूरी तैयारी के साथ प्रदेश के चुनावी दंगल में उतरने के लिए बेताब हैं, सभी दल अपनी–अपनी दावेदारी पेश करने में लगे हैं, किन्तु लोकतंत्र में असल दावेदार कौन होगा इसकी चाभी जनता के पास होती है। सत्ता की चाभी यूपी की जनता किसे सौंपती है यह भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। लेकिन, यूपी में जो सियासी बयार बह रही है उससे सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है कि यूपी की जनता सूबे में विकास का वनवास खत्म करने का मूड बना चुकी है।

उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता में दिनोंदिन इजाफ़ा देखने को मिल रहा है, पार्टी की जनता के बीच सक्रियता तथा केंद्र में स्थित मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियाँ, ये दो ऐसे कारण हैं जो सीधे तौर पर  लोगो को प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही, गौर करें तो सभी दल एक-दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप लगाने में  इतने व्यस्त हो गयें हैं कि प्रदेश में विकास का मुद्दा गौण हो गया है, लेकिन भाजपा विकास के एजेंडे के सहारे ही प्रदेश चुनाव को लड़ने की कवायद कर रही है। ये विकास की राजनीति जनता को निस्संदेह पसंद आएगी।

भाजपा की परिवर्तन यात्रा की रैलियों में उमड़ रहे जनसैलाब को देखकर उसी लहर का भान होता है, जो हमने लोकसभा चुनाव के दौरान देखा था। हर परिवर्तन रैली भीड़ के मामले में अपने ही रिकार्ड को ध्वस्त कर रही है। जनता का मिल रहा अपार जनसमर्थन भाजपा के लिए जहाँ उत्साह और ऊर्जा प्रदान कर रहा है, वहीँ विपक्षी दलों में बौखलाहट और हताशा का माहौल है। उत्तर प्रदेश में जैसे–जैसे सियासी सरगर्मी बढ़ी है, उससे एक बात तो स्पष्ट है कि यह चुनाव बहुत दिलचस्प होने वाला है। बहरहाल, वर्तमान में यूपी के चुनाव में सक्रिय मुख्य राजनीतिक दलों का सरसरी तौर पर मूल्यांकन करें तो बीजेपी को छोड़ सभी दलों में भारी अस्थिरता का महौल है, जिसका लाभ बीजेपी को मिलना तय है। समाजवादी पार्टी की नौटंकी हम सबके सामने है, कभी पिता–पुत्र तो कभी चाचा–भतीजे की लड़ाई इस हद तक पहुंच चुकी है कि समाजवादी पार्टी में दो फाड़ हो चुके हैं। यहाँ तक कि अब मामला चुनाव आयोग तक पहुँच चुका है। अभी यह पार्टी तथा  चुनाव चिन्ह वजूद में रहेगा कि नहीं, इसपर भी कुछ कहना जोखिम भरा होगा।

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कोई भी पार्टी जब अपने शासन का कार्यकाल पूरा कर रही होती है तो उसका दायित्व बनता है कि वह अपने कामकाज का लेखा–जोखा ईमानदारी के साथ जनता के समक्ष रखे लेकिन लगता है कि यूपी में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी ने इससे बचने का दूसरा रास्ता इजाद कर लिया। इन पांच वर्ष की हुकूमत के दौरान प्रदेश में भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी, कुशासन सर चढ़ के बोलता रहा है। जाहिर है कि अखिलेश के नेतृत्व वाली सरकार ने प्रदेश में विकास का कोई ठोस खाका भी तैयार करने में पूर्णतया विफल साबित हुई है, जिसके कारण यूपी की जनता सपा सरकार से खार खाए बैठी हुई है। यूपी की जनता अखिलेश से बीते पांच वर्षों के कामकाज का हिसाब मांग रही रही है, जिसका जवाब न तो पार्टी के पास है तथा न ही मुख्यमंत्री के पास। जनता के इन सवालों का जवाब देने की बजाय पूरा समाजवादी खेमा जनता को भ्रमित करने में पूरी ताकत झोंक रखा है, लेकिन इस सियासी ड्रामे ने समाजवाद के परिवारवादी वीभत्स चेहरे को जनता के सामने बेनकाब कर के रख दिया है। हास्यास्पद स्थिति यह है कि इस वर्चस्व की लड़ाई में समाजवादी पार्टी के दोनों खेमे अब भी अच्छे और सच्चे समाजवादी का नारा बुलंद करने में नहीं थक रहे हैं। अखिलेश और मुलायम से पूछा जाना चाहिए कि किस समाजवाद के लिए लड़ने का अभिनय वे कर रहे हैं, क्या परिवारवादी राजनीति के इस नग्न-नृत्य के बाद भी उनमें लोहिया का समाजवाद बचा रह गया है ?

उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल बसपा की विडम्बना अलग है, वह अभी तक नोटबंदी के फैसले के  सदमे में ही नज़र आ रही है। गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद मायावती पूरी तरह बौखलाई हुई हैं, वह यह साबित करने में अतिरिक्त मेहनत लगा रहीं हैं कि वर्तमान में स्थित केद्र सरकार दलित विरोधी है तथा नोटबंदी से सबसे ज्यादा नुकसान गरीबों तथा किसानों का हुआ है, जबकि स्थिति इसके विपरीत है। दूसरी तरफ पहले से ही लगातार मुंह की खा रही कांग्रेस यूपी चुनाव को लेकर पहले से ही निराश नजर आ रही है। कांग्रेस यूपी चुनाव के लिए कितनी गंभीर है, इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जब यूपी की सियासत अहम मुकाम पर है उस वक्त कांग्रेस युवराज विदेश में छुट्टियाँ बिताने चले गए हैं। इस समस्त अवलोकन के बाद से यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उत्तर प्रदेश में भाजपा की लोकप्रियता में दिनोंदिन इजाफ़ा देखने को मिल रहा है, पार्टी की जनता के बीच सक्रियता तथा केंद्र में स्थित मोदी सरकार की लोककल्याणकारी नीतियाँ, ये दो ऐसे कारण हैं जो सीधे तौर पर  लोगो को प्रभावित कर रहे हैं। साथ ही, गौर करें तो सभी दल एक-दूसरे पर आरोप–प्रत्यारोप लगाने में  इतने व्यस्त हो गयें हैं कि प्रदेश में विकास का मुद्दा गौण हो गया है, लेकिन भाजपा विकास के एजेंडे के सहारे ही प्रदेश चुनाव को लड़ने की कवायद कर रही है। सोमवार को लखनऊ में आयोजित महापरिवर्तन रैली में जो जनसैलाब इकठ्ठा हुआ था, वह भाजपा के विरोधी दलों की नींद उड़ाने वाला था। बेशक भाजपा विरोधी दल इस भीड़ को ‘भाड़े की भीड़” बोलकर खुद की पीठ थपथपा लें, लेकिन सच्चाई यही है कि बीजेपी हर रोज प्रदेश में मजबूत हो रही है, जिसका असर चुनाव परिणाम में देखने को अवश्य मिलेगा।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)