प्रक्रिया में बदलाव से सुपात्र नागरिकों तक पहुँच रहे पद्म सम्मान

पद्म सम्मान तो बीते साढ़े छः दशक से दिए जा रहे हैं, लेकिन इस तरह जनसामान्य के बीच से अचर्चित नायक-नायिकाओं को सम्मानित करने का काम इतने व्यापक रूप से पहले नहीं हुआ। दरअसल राजधानी में बैठी लॉबी के इशारों पर सम्मानों के वितरण का खेल देश में लम्बे समय तक चला है, जिसके लिए सम्मान की प्रमुख कसौटी सत्ता की जी-हुजूरी रही है। लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन सम्मानों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए नामांकन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया जिसका सुपरिणाम हमारे सामने है।

वर्ष 2014 के बाद से बीते तीन-चार वर्षों में पद्म सम्मानों के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व और सकारात्मक परिवर्तन नजर आया है। इस दौरान ऐसे नामों की घोषणा देखने को मिली है, जो बिना किसी संपत्ति या सम्मान की लालसा के लम्बे समय से अपने-अपने क्षेत्र में उत्तम कार्य कर रहे।

वर्ष 2017 में जब पद्म सम्मानों के नामों का ऐलान हुआ तो सम्मान पाने वालों में बिपिन गणात्रा, मीनाक्षी अम्मा, बाबा बलबीर सिंह, चिंताकिंदी मल्लेशम जैसे सामान्य पृष्ठभूमि के कई अचर्चित नाम शामिल थे, लेकिन उनका योगदान और समाज सेवा का भाव बड़ा था। इस तरह के नामों के ऐलान के साथ ही सिफारिशों और लॉबियों से मुक्त पद्म सम्मानों की एक नवीन परम्परा का सूत्रपात हुआ, जिसको बेहतर ढंग से आगे बढ़ाने का काम 2018 और 2019 से लेकर इस वर्ष तक सरकार ने किया है।

इस बार विभिन्न क्षेत्रों से सम्बंधित कुल 141 व्यक्तियों को पद्म सम्मानों के लिए चुना गया है, जिनमें सात प्रमुख हस्तियों को पद्म विभूषण, 16 लोगों को पद्म भूषण और 118 लोगों को पद्मश्री दिया जाएगा। जार्ज फर्नांडीज, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, श्री विश्वेशतीर्थ जी को मरणोपरांत यह सम्मान प्रदान करने की घोषणा हुई है, वहीं मुक्केबाज मैरीकोम, सुप्रसिद्ध लोकगायक पंडित छन्नूलाल मिश्र और मारीशस के पूर्व प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ को भी पद्म विभूषण देने का ऐलान हुआ है। पद्म भूषण की श्रेणी में भी मुजफ्फर हुसैन बेग, मनोहर पर्रीकर, आनंद महिंदा, पीटी उषा आदि नाम शामिल हैं।

लेकिन पद्म श्री की श्रेणी बीते वर्षों की तरह ही इसबार भी अनूठी है जिसमें सम्मानित व्यक्तियों में ज्यादातर नाम ऐसे हैं, जो लम्बे समय से संघर्षपूर्ण ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में बिना किसी लोभ-लालसा के उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई व्यापक पहचान नहीं है। हालांकि इसे विडंबना ही कहेंगे कि पद्म श्री के लिए जितनी चर्चा करण जौहर, कंगना रानाउत, अदनान सामी, एकता कपूर जैसे पहले से ही प्रसिद्ध लोगों की हो रही, उतनी इन अचर्चित लोगों की नहीं हो रही। जबकि चर्चा के केंद्र में यही लोग होने चाहिए।

आज जब चिकित्सा एक विशुद्ध व्यावसायिक कर्म बन गया है और सरकार को पहल करके मुफ्त चिकित्सा का प्रबंध करना पड़ रहा है, ऐसे वक़्त में उत्तराखंड के डॉ. योगी एरन किसी अजूबे की तरह ही हैं, जो अबतक जले-कटे हजारों मरीजों की निशुल्क प्लास्टिक सर्जरी करके उन्हें एक नया रूप दे चुके हैं। हालांकि अबसे पूर्व डॉ. योगी के विषय में शायद ही उनके निकटस्थ लोगों के सिवा किसीको कुछ पता रहा हो, लेकिन इसबार पद्म श्री के लिए चुने जाने के बाद उनके इस सेवा-कार्य को व्यापक पहचान मिलने की उम्मीद है। इसी तरह पंजाब के जगदीश लाल आहूजा सैकड़ों गरीबों को हर दिन मुफ्त भोजन मुहैया करवाते हैं। बीते 15 सालों से यह उनका नित्य नियम बना हुआ है और इस कारण स्थानीय स्तर पर उनकी पहचान लंगर बाबा के रूप में स्थापित हो गयी है।

ऐसे ही चाचा शरीफ के नाम से मशहूर मोहम्मद शरीफ  25 सालों से फैजाबाद और उसके निकट के क्षेत्रों में हजारों लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं। उनके इस कार्य में न तो उनका मज़हब कभी आड़े आया और न ही इस सेवा-कार्य के लिए कोई पहचान न मिलने का विचार ही उन्हें रोक पाया। निष्काम भाव से अपने कर्म में लगे मोहम्मद शरीफ को अबकी पद्म श्री देने की घोषणा हुई है।

तुलसी गावड़ा ने औपचारिक शिक्षा कुछ भी नहीं ली है, लेकिन पेड़-पौधों के विषय में उनकी जानकारी ऐसी है कि उन्हें ‘जंगल का इनसाइक्लोपीडिया’ कहा जाता है। आज जब प्रकृति को बचाने की चुनौती से मानवता दो-चार हो रही है, ऐसे वक़्त में प्रकृति संरक्षण के प्रति उनका समर्पण प्रेरणादायक है। बताते हैं कि वे अभी तक लाखों पौधों को पेड़ बना चुकी हैं, जिस कारण कर्णाटक सरकार ने उन्हें वन विभाग में नौकरी भी दी है। इस वर्ष पद्म श्री के लिए उनका चयन निःसंदेह पर्यावरण संरक्षण के लिए कार्यरत अनेक गुमनाम लोगों को और बेहतर करने की ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करेगा।

इसके अलावा संतरे बेचकर गरीब बच्चों के लिए स्कूल चलाने वाले हरेकला हजब्बा हों, पश्चिम बंगाल के सुन्दरवन में दो दशक से अधिक समय से सप्ताह में दो दिन गरीबों का मुफ्त इलाज करने वाले डॉ. अरुणोदय मंडल हों, खुद लकवाग्रस्त होते हुए भी दिव्यांग बच्चों के लिए कार्यरत एस रामकृष्णन हों या देश भर में घूमकर किसानों को आर्गेनिक खेती के गुर सिखाने वाले ओडिशा के राधामोहन और साबरमती हों अथवा अच्छी सरकारी नौकरी को ठुकराकर कम पानी में खेती की विधि पर काम करते हुए किसानों के लिए प्रेरणास्रोत बने सुंडाराम वर्मा हों, ऐसे अनेक लोगों के नामों से इसबार के पद्म श्री सम्मानों की सूची भरी पड़ी है। यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उस सूची में देखते ही पहचान में आने वाले नाम गिनती के हैं, अधिकांश नामों का परिचय पाने के लिए खोजबीन करनी पड़ती है।  

पद्म सम्मान तो बीते साढ़े छः दशक से दिए जा रहे हैं, लेकिन इस तरह जनसामान्य के बीच से अचर्चित नायक-नायिकाओं को सम्मानित करने का काम इतने व्यापक रूप से पहले नहीं हुआ। दरअसल राजधानी में बैठी लॉबी के इशारों पर सम्मानों के वितरण का खेल देश में लम्बे समय तक चला है, जिसके लिए सम्मान की प्रमुख कसौटी सत्ता की जी-हुजूरी रही है। लेकिन 2014 के बाद मोदी सरकार ने इन सम्मानों की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए नामांकन प्रक्रिया को ऑनलाइन कर दिया।

जनवरी 2018 में पद्म सम्मानों की घोषणा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में कहा था, ‘नामांकन प्रक्रिया में बदलाव का परिणाम है कि सामान्य लोगों ने सम्मान की श्रेणियों में जगह बनाई है। ऑनलाइन नामांकन इसमें पारदर्शिता लाया है… अब व्यक्ति की पहचान नहीं, उसका कार्य सम्मान के लिए महत्व रखता है।’

सरकार के इन प्रयासों का ही परिणाम है कि आज देश के दूसरी, तीसरी और चौथी वरीयता के ये सर्वोच्च नागरिकता सम्मान, सही अर्थों में अपने लिए सुपात्र नागरिकों तक पहुँच रहे हैं। यह भी कहना अनुचित नहीं होगा कि भारत की लोकतान्त्रिक व्यवस्था में पद्म सम्मान भले साढ़े छः दशकों से प्रदान किए जा रहे हों, लेकिन वास्तव में इनका लोकतांत्रिकरण अब जाकर हुआ है, जिसके लिए वर्तमान सरकार निश्चित ही सराहना की पात्र है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)