नीतीश कुमार

मूछ-दाढ़ी की बचकाना दलीलों की बजाय आरोपों का तथ्यात्मक जवाब दे, लालू परिवार !

लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें इन दिनों बढ़ी हुई हैं। यूँ तो लालू पहले से ही चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता हैं और जमानत पर घूम रहे हैं। लेकिन, अब उनसे लेकर उनके परिवार के सदस्यों तक के खिलाफ एक के बाद एक आरोप जिस तरह से सामने आए हैं तथा सरकारी एजेंसियों द्वारा उनपर कार्रवाई हुई है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि लालू की मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। शायद समय आ गया है कि उन्हें अपने पूरे कच्चे-

भारतीय राजनीति में भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुके हैं लालू यादव

लालू कोई गरीबों और मजलूमों की सामाजिक और आर्थिक तरक्की का धर्मयुद्ध नहीं लड़ रहे हैं। लालू का मकसद सिर्फ इतना है कि गैर कानूनी तौर पर इकठ्ठा किये हुए धन को कानून की नज़रों से कैसे छुपा लिया जाए। इस कारण जब से लालू यादव के परिवार के खिलाफ सीबीआई ने सख्ती बरती है, तो ध्यान भटकाने के उद्देश्य से लालू इसे सियासी रंजिश का नाम देकर बड़ा सियासी वितंडा

लालू यादव बताएं कि ये हजार करोड़ की संपत्ति कमाने के लिए उन्होंने कौन सी ‘मेहनत’ की है ?

लालू के परिवार के सदस्यों की संपत्ति अगर आयकर विभाग स्थाई तौर पर जब्त कर ले तो वे बिहार के ऐसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री होंगे जिन पर बेनामी संपत्ति कानून के तहत कार्रवाई होगी। पर, लालू इससे भी शर्मसार होने वाले नहीं हैं। लालू एक अजीब नेता हैं। वे अमीरों पर बरसते हुए खुद धन्नासेठ हो गए। याद नहीं आता कि लालू एंड फैमिली ने बिहार के अवाम का दुख-दर्द दूर करने के लिए भी कोई बड़ी पहल की हो।

नीतीश कुमार ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था का मखौल बना दिया है !

बिहार में शिक्षा की किस कदर दुर्गति हुई है, इसका प्रमाण हमें पिछले दो साल के टॉपर ही दे देते हैं। गणेश कुमार और रूबी राय। दो नाम ही काफी हैं, शैक्षणिक व्यवस्था के क्रमिक विनाश को समझने के लिए। 2015 में बिहार में बारहवीं की परीक्षा में 75 फीसद छात्र पास हुए, वहीं 2017 में सिर्फ 36 फीसद छात्र ही उत्तीर्ण हुए यानि 64 प्रतिशत छात्र फेल हो गए। दो वर्षों के नतीजों के बीच आया ये बड़ा अंतर चौंकाता है।

लालू पर लगे भ्रष्टाचार के ताज़ा आरोपों के बाद क्या सोच रहे होंगे नीतीश ?

चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव और उनके बेटे बेटियों के ठिकानों पर छापेमारी हुई। आरोप है कि उनके रेल मंत्री रहते हजार करोड़ रुपए के आसपास बेनामी संपत्ति उनके बेटों और बेटियों के नाम पर की गईं। यह तो जांच के बाद साफ हो पाएगा कि इन आरोपों में कितना दम है, लेकिन लालू यादव एक बार फिर से भ्रष्टाचार के आरोपों में बुरी तरह से घिरते नजर आ रहे हैं। पटना में अस्सी लाख की मिट्टी खरीद का आरोप

लालू यादव ने जो बोया था, वही काट रहे हैं !

बीती 6 मई को वरिष्ठ पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने अपने चैनल “रिपब्लिक टी वी” में एक ऑडियो टेप जारी किया, जिसमें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू प्रसाद यादव जेल में बंद जघन्य अपराधी शाहबुद्दीन से फोन पर बतिया रहे हैं। यह बहुत थोड़ी सी बातचीत ही है, लेकिन चौकाने वाली है; क्योंकि कई जुर्मों का अपराधी एक पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान में बिहार की सत्ता में साझेदार सबसे बड़ी पार्टी के

सत्ता के लोभ में लालू के जंगलराज को शह दे रहे नीतीश

जेल के अन्दर की दुनिया उतनी अँधेरी और मनहूस नहीं होती बशर्ते कि आपके पास पैसा हो, रसूख हो और बाहर आपका गॉडफादर बैठा हो। सियासत और अपराध का ऐसा घालमेल हमें बिहार से अच्छा सिर्फ फिल्मों में ही देखने को मिल सकता है, जहाँ जेल का बड़ा अधिकारी, पुलिस अफसर, माफिया डॉन और नेता मिलकर अपना एकछत्र साम्राज्य चलाते हैं।

जब लालू यादव ने इंद्र कुमार गुजराल को अपने कमरे से बाहर निकाल दिया !

लालू यादव, एक जमाने में सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर उभरे और जब रथयात्रा के दौरान लालकृष्ण आडवाणी को बिहार में गिरफ्तार किया गया तो उसके बाद से धर्म निरपेक्षता के भी चैंपियन माने जाने लगे । बिहार पर परोक्ष-प्रत्यक्ष रूप से करीब एक दशक से ज्यादा वक्त तक शासन किया । सामाजिक न्याय के उस दौर में मतदाताओं ने लालू यादव को अपार राजनीतिक ताकत दे दी थी । लालू यादव कहा भी करते थे कि

काटजू के बयान से ज्यादा ‘जंगलराज’ से शर्मिंदा होता है बिहार, नीतीश जी!

नेताओं के लिए बड़ा आसान होता है कि कोई भावनात्मक मुद्दा पकड़ लो और तुरंत अपने को राज्य और लोगों का हितैषी साबित कर दो। वो भी बिना कुछ किए धरे। यह सियासत का वह शॉर्टकट है, जिसे अपनाकर ज़मीन से कटे और जनता की नज़रों से गिरे हुए नेता भी चमक जाते हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस शॉर्टकट के पुराने खिलाड़ी हैं। जब-जब उनकी छवि पर ग्रहण लगता है और उनके अस्तित्व पर

यूपी चुनाव आते ही लामबंद होने लगा असहिष्णुता गिरोह

असहिष्णुता की बहस को गुजरे अधिक समय नहीं हुआ। यदि आप असहिष्णुता की पूरी बहस में सक्रिय गिरोह की भूमिका को याद करें तो यह बिहार चुनाव से ठीक पहले सक्रिय हुआ था और बिहार चुनाव के ठीक बाद असहिष्णुता की पूरी बहस शांत हुई थी। चुनाव के दौरान अखलाक की हत्या को कमान बनाकर वामपंथी गिरोह ने बिहार चुनाव में तीर चलाया था। खैर, नीतीश की जीत के बाद असहिष्णुता की पूरी