वामपंथी

कथित ‘केरल मॉडल’ पर लहालोट होने वाले केरल में बढ़ते कोरोना मामलों पर मुंह में दही जमा चुके हैं!

इसके पीछे केरल सरकार द्वारा कोरोना को हल्के में लिया जाना ही कारण है जिसने पूरे देश की चिंता बढ़ा दी है, क्‍योंकि यहां से यदि अन्‍य राज्‍यों में संक्रमण फैला तो स्थितियां कठिन हो जाएंगी।

भाजपा विरोधी अभियान में बदला कथित किसान आंदोलन

किसान आंदोलन अब राजनीतिक विरोध में तब्‍दील हो चुका है। यही कारण है कि आम किसान इस आंदोलन से दूरी बनाने लगे हैं।

बंगाल में विचारधारा को तिलांजलि दे तीसरे-चौथे स्थान की लड़ाई लड़ रहे कांग्रेस और वाम दल

केरल में जहां कांग्रेस-वाममोर्चा एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं वहीं बंगाल में दोनों साथ मिलकर चुनाव मैदान में हैं और सरकार बनाने के सपने देख रहे हैं।

कोरोना पर ‘केरल मॉडल’ की तारीफों के पुल बाँधने वाले वहाँ बढ़ते संक्रमण पर खामोश क्यों हैं?

अब जब पूरा देश कोरोना मुक्‍त होता जा रहा है तब केरल में कोरोना अभी भी कहर बनकर टूट रहा है। देश के कुल मामलों का 40 पतिशत केरल से आ रहा है।

कम्युनिस्ट से टीएमसी तक : पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा के उत्तरदायी घटक

जो बंगाल कला-संस्कृति की समृद्ध विरासत के लिए पूरी दुनिया में विख्यात रहा है, वह आज हिंसा, रक्तपात, राजनीतिक हत्याओं के लिए जाना-पहचाना जाने लगा है।

केरल : पलक्कड़ नगरपालिका में भाजपा की जीत के संकेत बहुत व्यापक हैं

वामपंथ अपने ही गढ़ में हाँफता हुआ तब दिखा, जब उसके मेयर के उम्मीदवार को बीजेपी के एक साधारण से कार्यकर्त्ता ने पराजित कर दिया।

जेएनयू में नए युग का आगाज

उम्मीद जगती है कि अब जेएनयू में आयातित वामपंथी विचारधारा का वर्चस्व कम होगा तथा भारतीयता के विचारों को प्रोत्साहन मिलेगा।

भारत के सामयिक उत्कर्ष को सुनिश्चित करने वाली है नयी शिक्षा नीति

नयी शिक्षा नीति सही अर्थों में शिक्षा को औपनिवेशिक चंगुल से मुक्ति की संकल्पना है तथा यह भारत के स्वत्व व स्वाभाविक सामर्थ्य को साकार करने का प्रयास भी है।

जम्मू-कश्‍मीर का शेष भारत से सही अर्थों में एकीकरण करने में कामयाब रही मोदी सरकार

अनुच्छेद-370 खत्म होने के एक लगभग एक साल पूरे होने पर आज हम देख सकते हैं कि सुरक्षा बलों की मुस्‍तैदी से न केवल आतंकवाद-अलगाववाद में कमी आई है, बल्‍कि आम जनता को राहत मिली है।

‘भारतीय कम्युनिस्टों का चरित्र ऐसा है कि वे किसी के सगे नहीं हो सकते सिवाय अपने स्वार्थों के’

वो वामपंथी उदारवादी जो असहमत होने के अधिकार को संविधान द्वारा दिया गया सबसे बड़ा अधिकार मानते हैं, वही दूसरों की असहमति को स्वीकार नहीं कर पाते।