सपा

यूपी चुनाव परिणाम : राजनीति बदल गई, राजनीतिक टूल्स बदल गए!

यूपी की ही भाँति उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा में भी भाजपा ने जनता की आकांक्षाओं को समझा और जनता ने भी उसे निराश नहीं किया है।

कांग्रेसी विधायक और सपा सांसद के बयानों से फिर उजागर हुई विपक्ष की महिला विरोधी सोच

पहले कर्नाटक के कांग्रेसी विधायक ने दुष्‍कर्म पर बेहद आपत्तिजनक बयान दिया, इसके बाद सपा सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने युवतियों के लिए अनर्गल बात बोली।

यूपी : विकास के मुद्दे पर अडिग भाजपा

यूपी में सपा-बसपा की पिछली दोनों सरकारों ने जहाँ जातिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति की वहीं वर्तमान भाजपा सरकार विकास की राजनीति कर रही है।

यूपी जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में भाजपा की जीत के निहितार्थ

कोरोना काल के दौरान भाजपा संगठन ने अपनी जमीनी सक्रियता को कायम रखा। सभी स्तरों पर सक्रियता थी। दूसरी तरफ विपक्ष इस मामले में पिछड़ गया।

कोरोना वैक्सीन पर राजनीति विपक्ष की मुद्दाहीनता को ही दिखाती है

कोरोना आपदा से लेकर उसकी वैक्सीन तक विपक्ष की राजनीति दर्शाती है कि इस देश में विपक्ष किस कदर मुद्दाहीन हो गया है। 

योगी सरकार के तीन वर्ष: विकास के नए आयामों को छूता उत्तर प्रदेश

डेढ़ दशक की जातिवाद, भ्रष्टाचार और गुंडाराज वाले सपा-बसपा शासन से मुक्ति प्राप्त करने के लिए उत्तर प्रदेश की जनता 11 फरवरी 2017 से लेकर 8 मार्च 2017 तक ईवीएम में भाजपा के चुनाव चिन्ह कमल पर बटन दबा रही थी। परिवारवाद को समाजवाद पर हावी करने वाले अखिलेश यादव की सपा, प्रदेश की राजनीति में अप्रासंगिक चुकी कांग्रेस तथा राजनीतिक

राजनीतिक जमीन खोती जा रही बहुजन समाज पार्टी

समय बहुत बलवान होता है इस कहावत बहुजन समाज पार्टी की अध्‍यक्ष मायावती से अधिक कोई नहीं समझ सकता। जिस बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन के लिए कभी राष्‍ट्रीय दल लाइन लगाए रहते थे वही बसपा अब अपने अस्‍तित्‍व के लिए जूझ रही है। उत्‍तर प्रदेश में हुए विधानसभा उप चुनाव में मिली करारी शिकस्‍त ने बसपा प्रमुख मायावती की नींद उड़ा दी है। उन्‍हें डर लगा

‘मोदी ने महागठबंधन के विषय में जो कहा था, वो एकदम सच साबित हुआ’

शिखर पर तो दोनों पार्टियों की दोस्ती हो गई। लेकिन जमीन पर ऐसा खुशनुमा माहौल नहीं बन सका। डेढ़ दशक तक दोनों के बीच तनाव रहा। इनके लिए यह सब भूल जाना मुश्किल था। पहले कांग्रेस फिर बसपा से गठबन्धन के समय अखिलेश यादव ने दूरदर्शिता से काम नहीं लिया जिसके चलते सपा को नुकसान उठाना पड़ा। वैसे भी इस तरह के सिद्धांतहीन गठजोड़ का यही हश्र होना था।

क्या लोकसभा चुनाव के साथ ही बुआ-बबुआ का लगाव भी खत्म हो गया?

उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा हो रहा है जिसे आप हास्यास्पद कह सकते हैं। यहाँ जितनी तेजी के साथ गठबंधन बना उससे कहीं तेजी से उसका पटाक्षेप भी होता दिख रहा है। आम चुनाव से ठीक पहले मोदी-शाह की जोड़ी को रोकने के लिए मायावती और अखिलेश ने चुनावी गठबंधन किया, जिसका आशय था दलित और यादव वोट बैंक को एकदूसरे के खाते में

मोदी की सुनामी में ध्वस्त हुए जातिवादी समीकरण

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबन्धन भी समीकरण के हिसाब से हुआ था। ये सारे समीकरण जातिवादी मतों के फार्मूले से बनाये गए थे। लेकिन ये जातिवादी दल समझ ही नहीं सके कि गरीबों के लिए चलाई गई मोदी सरकार की योजनाओं से करोड़ो लोग सीधे लाभान्वित हो रहे हैं, जिनमें सभी जाति वर्ग के लोग शामिल हैं। ऐसे लोगों ने जातिवादी