शहीदों के राष्ट्र-निर्माण के स्वप्न को पूर्ण करने में ही है आज़ादी की सार्थकता!

भारत आज अपनी आजादी की 70 वीं सालगिरह मना रहा है। लाल किले पर तिरंगा फहर चुका है । सन् 1947 को आज ही के दिन भारत ने लगभग 200 वर्षों की अंग्रेजी दासता के बंधनों को तोड़ कर आजादी का प्रथम सूर्योदय देखा था। आजादी के इस आंदोलन में कितनी शहादतें हुई, ये अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है। देश के हर गांव के ही आस-पास ऐसी कई कहानियां होगी, जिनसे हम आज भी अनजान हैं।

विचारार्थ जो आज सबसे अहम् प्रश्न है कि, आखिर वो कौन सा सपना स्वतंत्रता की बेदी पर बलिदान हुए शूरवीरों की आँखों में था, जिसने उन्हें अपना सर्वस्व उत्सर्ग करने को प्रेरित कर दिया ? वो क्या लालसा थी, जिसने उन्हें स्वयं से ऊपर उठकर समष्टि और राष्ट्र के उत्कर्ष के भाव से कुछ यूँ भर दिया कि बाकी सारे भाव पीछे छूट गए। आज यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि उनके लिए आजादी का क्या मतलब था?  किस सपने के लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी। क्या उन्होंने ऐसी आजादी का सपना देखा था जहाँ हर कोई स्वच्छन्द हो, जिन्हें समाज और राष्ट्र का भी बंधन ना मानना पड़े। नहीं, बिलकुल नहीं! उन्होंने जिस सपने को देखा था, वो था स्वतंत्रता का सपना। अब ये प्रश्न उठता है कि क्या होती है ये स्वतंत्रता? आज़ादी से यह किस तरह भिन्न है ? ये स्वतंत्रता भी क्या अपने साथ कुछ बंधनों को लाती है?  क्या होता है, ये स्व का तंत्र जो व्यक्ति को अपने प्राणों का उत्सर्ग करने को प्रेरित कर देता है?  अगर इन सारे प्रश्नो के मूल को हम समझ गए तो हम यह भी समझ जायेंगे कि हमें हमारा व्यवहार किस तरह रखना है एवं राष्ट्र को किस दिशा में ले जाना है।

राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया होती है और ये निरंतर आहुति मांगती है। आज से 70 साल पहले लोगों ने जो किया वो उस समय की आवश्यकता थी। अब हमें उससे आगे राष्ट्र की आज की आवश्यकता को समझ कर उसे पूरा करना ही होगा। और यही सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी उन सभी को जिन्होंने हमारे पैदा होने से पहले ही हमारे लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। सुखद यह है कि केंद्र की वर्तमान सरकार राष्ट्र-निर्माण के हमारे स्वतंत्रता बलिदानियों के इस स्वप्न की पूर्ण करने की दिशा में सफलतापूर्वक प्रयास कर रही है और देश के पुनर्निर्माण की तरफ अग्रसर है।

किसी भी राष्ट्र के जीवन का आधार वहां की आस्था, वहां का तंत्र, वहां की संस्कृति होती है, जिसका निर्माण वहां के पूर्वजों ने वहां की परिस्थितियों के आधार पर किया होता है एवं जिससे वहाँ का जीवन स्वतः संचालित होता है। यह संस्कृति, यह चिति किसी भी राष्ट्र की अवधारणा का मूल होती है, जो राष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों में ठीक उसी तरह परिलक्षित होती है जैसे बीज पूरे वृक्ष में। पत्तों में तनाओ में जड़ में फल और फूल में सभी में बीज का ही रूप तो विद्यमान होता है। उसी तरह भारत जैसे सभ्यतावादी राष्ट्र में इसकी अपनी विशिष्ट आत्मा, संस्कृति और अपनी चिति निवास करती है। इस राष्ट्र की आजादी का अर्थ यहाँ का तंत्र उसी राष्ट्र रूपी बीज से संचालित होना है, जिसका निर्माण हमारे मनीषियों ने किया है। जो कि हमारा अपना तंत्र है, स्वतंत्र है। इसका निर्माण कोई 100 या 200 सालों के काल खंड में नहीं वरन् 5000 साल पुराने और उस समय से निरंतर अद्यतन होते आ रहे चिंतन में है। यही अंतर था अंग्रेजी शासन व्यवस्था और भारत की चिति और इसके तंत्र में जिसके हेतु हमने संघर्ष किया। ये केवल अंग्रेजों के ही खिलाफ नहीं अपितु हर उस व्यवस्था के खिलाफ था जो हमारे अखंड भारत के चिंतन और  आचार्य चाणक्य की सोच से भिन्न थी। महर्षि अरविंद इस विषय पर विशेष जोर देते हैं।

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साभार : गूगल

अब प्रश्न उठता है कि हमारे राष्ट्र का आधार, हमारे राष्ट्र की चिति क्या है और यह अंग्रेजों से कैसे भिन्न है? हमारे राष्ट्र का आधार हमेशा से ज्ञान, विज्ञान, अध्यात्म, मानवता, न्याय, सत्य, अहिंसा, पौरुष, एवं व्यक्ति की श्रेष्ठता में रहा है। यहाँ मानव  मात्र के भी अपने कृत्य से देवत्व हासिल करने की परिकल्पना है एवं समस्त जगत एक दूसरे के परस्पर रूप मात्र हैं। हमारा राष्ट्र कभी किसी राजा या व्यवसाय या उपनिवेशवाद का जरिया नहीं रहा और न ही हो सकता है। वेलफेयर स्टेट की कल्पना पश्चिम में बहुत नयी है, परंतु भारत वर्ष में राष्ट्र संचालकों का यह शुरू से ही प्रथम दायित्व रहा है एवं जिसमें नागरिकों के भी दायित्व ऐसे ही रहे हैं। शासक एवं शासित हमेशा से भारत में एक दूसरे के पूरक हों ऐसी ही राज व्यवस्था की परिकल्पना रही है, जो कि कमोबेश मुग़ल शासन तक रही भी फिर क्रमशः क्षीण होती चली गयी।

अग्रेजों और उसके पहले मुगलों और समकालीन कुछ हिन्दू राजाओ ने जिस तरह राज्य का अर्थ राष्ट्र से ऊपर बना दिया, यह बिलकुल भी उस राज्य-राष्ट्र की संकल्पना से भिन्न था जो की चाणक्य ने दिया था या जिसे पाने के लिए हमने आजादी की लड़ाई लड़ी। दुर्भाग्य से राजनीति की उसी स्वार्थी बिसात के कारण ईश्वर रूपी भारत राष्ट्र का बंटवारा हुआ, परंतु हम आज भी हमारे उन  मनीषियों से प्रेरणा ले कर भारत माँ की सेवा में रत हैं, जिन्होंने हमारे इस तंत्र का निर्माण किया है। गण तंत्र की व्यवस्था – हमारी ऐतिहासिक व्यवस्था – आज के लोकतंत्र से भी परिष्कृत रूप में विद्यमान थी। वही हमारी चिति है और अब हम उसी दिशा में अग्रसर हैं।

आज हमारी सरकारें दूर दूर के गांवों में जाकर पहली बार नागरिकों को आत्म निर्भर बनाने का प्रयास कर रही है। यह प्रयास भी उसी आज़ादी को पाने की दिशा में है। जब हम सभी को अवसर मिले एवं हर व्यक्ति की शासन में भागीदारी तो हो ही, साथ ही साथ ज्ञान का भी सम्मान हो। सरकार के समस्त प्रयास लेकिन तभी सफल हो पाएंगे जब आम जन भी किसी आज़ादी के लिए लड़ रहे शहीदों सा जज़्बा दिखाएंगे। प्रयास बहुत छोटा ही सही अपितु बिलकुल रामायण के गिलहरी प्रयास जैसा होना पड़ेगा। तब जाकर इन योजनाओं से गांधी के स्वावलंबन की महक आएगी एवं अपने राष्ट्र का स्व तंत्र मज़बूत होगा जिसके हिमायती, गांधी, आंबेडकर, दीनदयाल, एवं लोहिया चारों थे।

राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया होती है और ये निरंतर आहुति मांगती है। आज से 70 साल पहले लोगों ने जो किया वो उस समय की आवश्यकता थी। अब हमें उससे आगे राष्ट्र की आज की आवश्यकता को समझ कर उसे पूरा करना ही होगा। और यही सच्ची श्रधांजलि भी होगी उन सभी को जिन्होंने हमारे पैदा होने से पहेली ही हमारे लिया अपना जीवन दान दे दिया। सुखद यह है कि केंद्र की वर्तमान सरकार इस दिशा में सफलतापूर्वक प्रयास कर रही है और देश के पुनर्निर्माण की तरफ अग्रसर है। अंत में लेखनी यही कहना चाहेगी कि;

आजादी के इस सफ़र में, अभी बहुत सपने बचे हैं साथी।
अभी कुछ दूर चले हैं हम, पर मीलों का सफ़र है बाकी।