मुद्दाहीन कांग्रेस के वैचारिक दिवालियेपन को दिखाता है पकौड़ा प्रकरण !

असल में सच्‍चाई यह है कि कांग्रेस के पास केंद्र सरकार के दोष गिनाने के लिए कुछ भी नहीं है। बहुत कोशिशों के बाद भी विपक्ष को भाजपा सरकार की कोई खामी पकड़ में नहीं आ रही है, इसलिए अब उन्‍हें बहुत ही निम्‍न स्‍तर पर जाकर बेहद सतही और गैर ज़रूरी बातों को मुद्दा बनाना पड़ रहा है। यह विपक्ष के मानसिक दिवालियेपन का भी प्रतीक है और साथ ही इससे उनकी घबराहट व असुरक्षा की भावना का भी पता चलता है।

देश की राजनीति में इन दिनों उथल-पुथल मची हुई है। यह उथल-पुथल बहुत वैचारिक, गंभीर या निर्णायक न होकर सतही, हंगामे वाली और व्‍यर्थ की है। विपक्ष इस फिजूल हंगामे का सञ्चालन कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों एक साक्षात्‍कार में देश में स्‍वरोजगार को लेकर एक टिप्‍पणी की जिसके बाद मुद्दों को तरस रहे विपक्ष ने बेसिर पैर की प्रतिक्रिया व्‍यक्‍त करना शुरू कर दी। प्रधानमंत्री ने यह कहा था कि इस देश में बेरोजगारी जैसी कोई चीज़ नहीं है।

स्‍वरोजगार एक ऐसा उपाय है जो हमेशा कारगर रहेगा। इसका उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा कि यदि कोई व्‍यक्ति किसी दफ्तर के बाहर पकौड़ा भी बेचता है और बदले में कमाई करके जाता है तो यह भी बुरा काम नहीं है। उनके इस स्‍वरोजगारोन्‍मुखी विचार की विपक्ष ने तोड़-मरोड़कर व्‍याख्‍या करना शुरू कर दी और कुतर्क करते हुए यह दुष्‍प्रचार करना शुरू कर दिया कि पीएम शिक्षित युवाओं को छोटे काम करने की प्रेरणा दे रहे हैं।

विपक्ष ने इसे पकौड़ा पॉलिटिक्‍स का नाम देते हुए तरह-तरह के स्‍वांग रचना शुरू कर दिया है। असल में इस बात को मूल से समझा जाना चाहिये। प्रधानमंत्री का अभिप्राय हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने की तुलना में कुछ करके दिखाने से है, जिससे आय होती रहे। इस आधारभूत विचार को समझने में विपक्ष पूरी तरह से असफल रहा है। निश्चित ही कांग्रेस को इस पर बवाल मचाने से पहले अपने गिरेबान में झांककर देखना चाहिये कि देश के विकास में उनका क्‍या योगदान है। बीते साठ वर्षों के दौरान देश को बेरोजगारी के गर्त में झोंककर, पिछड़ेपन में धकेलकर कांग्रेस को पीएम के विचारों पर टिप्‍पणी करने का कतई नैतिक अधिकार नहीं रह गया है।

भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने पकौड़ा पॉलिटिक्स पर राज्यसभा में काग्रेस को दिखाया आइना

भाजपा के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह ने भी इस मसले पर राज्‍यसभा में अपने पहले संबोधन में बेबाक बयान दिया। उन्‍होंने कांग्रेस की गैर-व्यावहारिक और अपरिपक्‍व सोच पर खेद प्रकट करते हुए कहा कि यदि कांग्रेस को बेरोजगारों की इतनी ही चिंता है तो उसे खुद सोचना चाहिये कि यह नौबत कैसे आई। देश में 55 साल तक राज करने के बाद भी कांग्रेस रोजगार के विकल्‍प उपलब्‍ध नहीं करा पाई है तो यह कांग्रेस की सबसे बड़ी असफलता है। देखा जाए तो अमित शाह ने अपने बयान में कांग्रेस को न केवल आइना दिखाने का काम किया बल्कि उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया। निश्चित ही यह टटोलने जैसी बात है कि कांग्रेस ने मनरेगा के तहत बेरोजगारों को गड्ढे खोदने पर मजबूर कर दिया। जब कांग्रेस की दृष्टि में गड्ढे खोदना छोटा काम नहीं है तो पकौड़ा, चाय या कुछ भी खाद्य सामग्री बेचकर जीविका उपार्जन करना कैसे गलत हो गया।

असल में सच्‍चाई यह है कि कांग्रेस के पास केंद्र सरकार के दोष गिनाने के लिए कुछ भी नहीं है। बहुत कोशिशों के बाद भी विपक्ष को भाजपा सरकार की कोई खामी पकड़ में नहीं आ रही है, इसलिए अब उन्‍हें बहुत ही निम्‍न स्‍तर पर जाकर बेहद सतही और गैर ज़रूरी बातों को मुद्दा बनाना पड़ रहा है। यह विपक्ष के मानसिक दिवालियेपन का भी प्रतीक है और साथ ही इससे उनकी घबराहट व असुरक्षा की भावना का भी पता चलता है।

यदि कांग्रेस ने मोदी सरकार पर कीचड़ उछालने से पहले सचमुच गंभीरता से अध्‍ययन किया होता तो उन्‍हें पता चलता कि मोदी सरकार ने विभिन्‍न नई योजनाओं से युवाओं को रोज़गार देने का काम किया है। डिजिटल इंडिया के तहत देश में नई नौकरियों का सृजन हुआ है। स्‍टार्ट अप्‍स के बढ़ते माहौल के अनुसार शासन ने अपने नियमों को लचीला बनाया है ताकि नए स्‍टार्ट अप शुरू हो सकें, वे काम कर सकें और ना केवल खुद आय प्राप्‍त करें बल्कि दूसरों को भी रोज़गार प्रदान करें और देश का राजस्‍व भी बढ़े।

कांग्रेस कार्यकर्ताओं की पकौड़ा पॉलिटिक्स

यदि पकौड़ा बेचने को कांग्रेस हेय दृष्टि से देखती है तो इससे कांग्रेस की ही सामंती सोच का ही पता चलता है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि समाज के छोटे तबके के लोगों के प्रति कांग्रेस के मन में कितनी दुर्भावना है और वह उन्‍हें नागरिक न मानकर बड़े-छोटे के तराजू से तौल रही है। व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो पकौड़ा ही नहीं, अन्‍य खाद्य सामग्री का विक्रय करके आय प्राप्‍त करना तो एक आत्‍म-सम्‍मान से जीने का काम होता है। बेरोज़गार होकर बैठने या अपराध के रास्‍ते पर बढ़ने से निश्चित ही पकौड़ा बेचना कहीं अधिक श्रेयस्‍कर है। कांग्रेस की उथली मानसिकता पर आश्‍चर्य होता है कि उन्‍हें जन धन योजना, उज्‍जवला योजना आदि नहीं दिखाईं दीं, जिनसे गरीब तबके के करोड़ों लोगों का कल्‍याण हुआ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की व्‍यक्तिगत अपील के बाद ही सवा करोड़ से अधिक लोगों ने एलपीजी गैस की सब्सिडी छोड़ी जिसका लाभ निम्‍न तबके को मिला। उन्‍होंने हालिया आम बजट में नेशनल हेल्‍थ स्‍कीम की भी शुरुआत की है। मोदी सरकार के कार्यकाल में ही सुदूर अंचल की महिलाओं को लकड़ी, पत्‍ते जलाकर धुंए में खाना बनाने से मुक्ति मिली। इस सरकार के कार्यकाल में ही स्‍वच्‍छता अभियान एक जन आंदोलन बना। आज पूरा देश सफाई को लेकर आगे आया है। सभाएं हो रही हैं, नुक्‍कड़ हो रहे हैं। देश में स्‍वच्‍छता को लेकर पुरस्‍कार दिए जा रहे हैं जिससे सकारात्‍मक प्रतिद्वंद्विता का माहौल बना है। देश में शौचालय को लेकर इससे पहले किसी भी सरकार ने सोचा भी नहीं था।

कांग्रेस की सरकार ने कभी भी समाज के आखिरी कतार में खड़े व्‍यक्ति का जीवन स्‍तर ऊंचा उठाने पर ध्‍यान नहीं दिया। कांग्रेस सरकार के घोटालों और कुनीतियों ने देश को आर्थिक संकट में डालने का काम किया है। इस पार्टी के नेता व्‍यक्तिगत जीवन में भी संदिग्‍ध चरित्र के रहे हैं। कांग्रेस ने ना कभी सामाजिक सुधार किया ना ही आर्थिक सुधार। मोदी सरकार ने दो बड़े आर्थिक सुधार नोटबंदी व जीएसटी लागू किए और कई अन्य योजनाओं व कानूनों के माध्‍यम से सामाजिक सुधार किए हैं।

देश के नेतृत्‍व को सहयोग करने की बजाय कांग्रेस ने गंदी शब्‍दावली का प्रयोग करते हुए, अभद्रता की सीमाएं लांघी। प्रधानमंत्री पर व्‍यक्तिगत हमले किए और अपनी हीनता की भावना को मिटाने के लिए वे अब स्‍वरोजगार के विचार का भी मज़ाक उड़ाने की निम्‍न सोच प्रदर्शित करने से बाज नहीं आ रहे हैं। जब मोदी सरकार ने 2014 में कार्यभार संभाला था, तब उन्‍हें देश गर्त में गिरा हुआ मिला था। आज उसी देश को उन्‍होंने प्रगति के पथ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि केंद्र सरकार अपने ध्‍येय वाक्‍य सबका साथ सबका विकास को उत्‍तरोत्‍तर चरितार्थ कर रही है और इसका नतीजा है कि आज भारत वैश्विक पटल पर एक मज़बूत अर्थव्‍यवस्‍था और प्रगतिशील सोच वाले राष्‍ट्र के रूप में पहचान बना चुका है। जहां तक पकौड़ा पॉलिटिक्‍स की बात है तो यह कांग्रेस की खीझ मिटाने से अधिक और कुछ नहीं है। बहुत संभव है कि अपनी घबराहट में कांग्रेस आने वाले दिनों में इससे भी निचले स्‍तर पर आ जाए और अपने वैचारिक दिवालियेपन का प्रदर्शन करे, लेकिन उनके बेसिर पैर के हंगामों से वे स्‍वयं अपनी हार की घोषणा ही कर रहे हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)