जनसंघ

मोदी 2.0 : वैचारिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने वाला एक साल

नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल को हम वैचारिक संकल्प की कसौटी पर परखें तो समझ में आता है कि आज़ादी के उपरांत जनसंघ के समय से जो वादें पार्टी करती आ रही थी, उन्हें पूरा करने का यश नरेंद्र मोदी को प्राप्त हुआ है।

पी. परमेश्वरन का जीवन-संदेश हमारी स्मृतियों में सदैव अमर रहेगा

समाज को संगठित, शक्तिशाली, अनुशासित और स्वावलम्बी करने के कार्य में जिन्होंने अपने जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण समर्पित कर दिया, ऐसे कर्म योगी माननीय परमेश्वरन जी अब हमारे बीच नहीं हैं।  लेकिन कभी आराम ना मांगने वाले, विश्राम ना मांगने वाले, ‘चरैवेति चरैवेति’ ऐतरेय उपनिषद का यह मंत्र अपने जीवन में एकात्म करने वाले परमेश्वरन जी हमारी

ये आंकड़े बताते हैं कि क्यों जरूरी है नागरिकता संशोधन विधेयक?

तीन तलाक पर क़ानून बनाकर, कश्मीर से धारा 370 हटाकर, राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब नागरिकता संशोधन बिल को लोकसभा से पारित कराकर मोदी सरकार ने अपनी नीतियां बिलकुल साफ़ कर दी हैं। इस सरकार की खासियत ही कही जाएगी कि एक के बाद एक महत्वपूर्ण और युगांतरकारी परिवर्तन की नींव रखने में कामयाब हो रही है।

जयंती विशेष : दीनदयाल उपाध्याय के विचारों की प्रासंगिकता

दीनदयाल उपाध्याय राजनेता के साथ-साथ उच्च कोटि के चिंतक, विचारक और लेखक भी थे। इस रूप में उन्होंने श्रेष्ठ, शक्तिशाली और संतुलित रूप में विकसित राष्ट्र की कल्पना की थी। उन्होंने निजी हित व सुख सुविधाओं का त्याग कर अपना जीवन समाज और राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। यही बात उन्हें महान बनाती है

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी: ‘उनमें श्रेष्ठता की ऊर्जा थी, वे जिस क्षेत्र में गए श्रेष्ठ बनकर उभरे’

आज भारतीय जनसंघ के संस्‍थापक डॉ. श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी का 67वां बलिदान दिवस है। हालांकि उनकी पहचान जनसंघ के संस्‍थापक की तौर पर ही अधिक है लेकिन वे बहुआयामी व्‍यक्तित्‍व के धनी थे।

शिक्षाविद् से लेकर राजनेता तक हर किरदार में कामयाब रहे डॉ मुखर्जी!

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी भारतीय राजनीति के एक ऐसे महान व्यक्तित्व का नाम है, जिन्होने आज़ादी के पश्चात् देश की एकता–अखंडता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। राजनेता सहित एक शिक्षाविद और देश के पहले उद्योग मंत्री के नाते भारतीयता व राष्ट्रवाद को लेकर उन्होंने जो विचार दिए, वे आज भी प्रासंगिक हैं।

‘अगर डॉ मुखर्जी कुछ समय और जीवित रह जाते तो पूरी तरह से खत्म हो जाती कश्मीर समस्या’

राष्ट्रवादी नेता, शिक्षाविद और प्रखर सामाजिक चिंतक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस की विभाजनकारी नीतियों के लेकर शुरू से ही परिचित थे। आजादी के बाद सरदार पटेल और महात्मा गांधी के आग्रह पर वे नेहरू की कैबिनेट में शामिल ज़रूर हुए थे, लेकिन यह साथ ज्यादा दिन तक नहीं चल सका।

भाजपा : एक विचारधारा के फर्श से अर्श तक पहुँचने की संघर्षपूर्ण यात्रा !

आज भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है, 6 अप्रैल, 1980 को भाजपा की स्थापना हुई थी। इन 38 वर्षों की यात्रा को कुछ शब्दों में पिरोना आसान नहीं होगा, क्योंकि इतना बड़ा संगठन कभी भी एक व्यक्ति की मेहनत का नतीजा नहीं होता, बल्कि इसके पीछे हजारों-लाखों कार्यकर्ताओं के खून और पसीने का योगदान होता है, जिनके चेहरे कभी अख़बारों में या टेलीविज़न के परदे पर नहीं नज़र आते। भाजपा की

जयंती विशेष : भारतीयता के चिंतक दीन दयाल उपाध्याय

राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक विकास को लेकर दुनिया के तमाम विद्वानों ने अलग-अलग वैचारिक दर्शन प्रतिपादित किए हैं। लगभग प्रत्येक विचारधारा समाज के राजनीतिक, आर्थिक उन्नति के मूल सूत्र के रूप में खुद को प्रस्तुत करती है। पूँजीवाद हो, साम्यवाद हो अथवा समाजवाद हो, प्रत्येक विचारधारा समाज की समस्याओं का समाधान देने के दावे के साथ

स्वस्थ लोकतंत्र के लिए लोकमत के परिष्कार को आवश्यक मानते थे दीनदयाल उपाध्याय

पं. दीनदयाल उपाध्याय ने स्वस्थ लोकतंत्र के लिए लोकमत के परिष्कार का सुझाव दिया था। उस समय देश की राजनीति में कांग्रेस का वर्चस्व था। उसके विकल्प की कल्पना भी मुश्किल थी। दीनदयाल जी से प्रश्न भी किया जाता था कि जब जनसंघ के अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो जाती है, तो चुनाव में उतरने की जरूरत ही क्या है। दीनदयाल उपाध्याय का चिंतन सकारात्मक था। उनका कहना था कि चुनाव के