मायावती

संकट के समय भी चुनावी राजनीति में उलझी है कांग्रेस

आजादी के बाद से ही कांग्रेसी सरकारें गरीबों के कल्‍याण का नारा लगाकर अपनी और अमीरों की तिजोरी भरती रही हैं। यही कारण है कि बिजली, पानी, अस्‍पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से दूर रहीं।

राजनीतिक जमीन खोती जा रही बहुजन समाज पार्टी

समय बहुत बलवान होता है इस कहावत बहुजन समाज पार्टी की अध्‍यक्ष मायावती से अधिक कोई नहीं समझ सकता। जिस बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन के लिए कभी राष्‍ट्रीय दल लाइन लगाए रहते थे वही बसपा अब अपने अस्‍तित्‍व के लिए जूझ रही है। उत्‍तर प्रदेश में हुए विधानसभा उप चुनाव में मिली करारी शिकस्‍त ने बसपा प्रमुख मायावती की नींद उड़ा दी है। उन्‍हें डर लगा

क्या लोकसभा चुनाव के साथ ही बुआ-बबुआ का लगाव भी खत्म हो गया?

उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा हो रहा है जिसे आप हास्यास्पद कह सकते हैं। यहाँ जितनी तेजी के साथ गठबंधन बना उससे कहीं तेजी से उसका पटाक्षेप भी होता दिख रहा है। आम चुनाव से ठीक पहले मोदी-शाह की जोड़ी को रोकने के लिए मायावती और अखिलेश ने चुनावी गठबंधन किया, जिसका आशय था दलित और यादव वोट बैंक को एकदूसरे के खाते में

मोदी की सुनामी में ध्वस्त हुए जातिवादी समीकरण

उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबन्धन भी समीकरण के हिसाब से हुआ था। ये सारे समीकरण जातिवादी मतों के फार्मूले से बनाये गए थे। लेकिन ये जातिवादी दल समझ ही नहीं सके कि गरीबों के लिए चलाई गई मोदी सरकार की योजनाओं से करोड़ो लोग सीधे लाभान्वित हो रहे हैं, जिनमें सभी जाति वर्ग के लोग शामिल हैं। ऐसे लोगों ने जातिवादी

कांग्रेस : एक राष्ट्रीय पार्टी से एक ‘वोटकटवा’ पार्टी तक का सफर

कांग्रेस की इस हालत  कि उसे क्षेत्रीय दलों के बीच वोटकटवा पार्टी की भूमिका निभानी पड़ रही है, के लिए उसके भीतर मौजूद परिवारवादी राजनीति और नेताओं का अहंकारी चरित्र ही जिम्मेदार है। कांग्रेस यह माने बैठी   रही और शायद आज भी है   कि ये देश उसकी जागीर है और यहाँ सत्ता उसीके हाथ रहनी है। इस  अहंकार में जनता और जनता के हित से दूर हो   चुकी इस पार्टी की ये दुर्गति तो होनी ही थी। लोकतंत्र में जनता सबसे अधिक सम्माननीय होती है, वो अर्श पर

महागठबंधन: हर हप्ते बदल रहा विपक्ष का प्रधानमंत्री उम्मीदवार

चुनाव से पहले देश की राजनीति बहुत हो रोचक दौर में प्रवेश कर गई है। विपक्षी गठबंधन का आलम यह है कि विपक्ष की तरफ से हर हफ्ते प्रधानमंत्री पद के नए दावेदार सामने आ रहे हैं। आज उन्हीं नामों की चर्चा जो प्रधानमंत्री पद की रेस में बने हुए हैं।कांग्रेस देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी है (संसद में वैसे कांग्रेस को विपक्षी दल का स्टेटस हासिल नहीं है), जिसके अध्यक्ष राहुल गाँधी पिछले कई सालों से प्रधानमंत्री पद की दौड़ में लगातार बने हुए हैं।

अगर राहुल भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं, तो ममता-माया-अखिलेश जैसों के घोटालों पर क्यों नहीं बोलते?

क्या राहुल रॉफेल डील से सचमुच असंतुष्ट हैं? अगर हाँ, तो जैसा कि रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, उन्हें ठोस सबूत पेश करने चाहिए। अगर वो कहते हैं और मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अनिल अंबानी को 30 हज़ार करोड़ रुपए दिए हैं तो इसे सिद्ध करें, कहीं न कहीं किसी ना किसी खाते में पैसों का लेनदेन दिखाएं।

मायावती के झटके के बाद महागठबंधन की खिचड़ी पकना आसान नहीं

गत मई में हुआ कुमारस्वामी का शपथ ग्रहण समारोह विपक्ष के लिए किसी उत्सव से कम नहीं था। विपक्ष का शायद ही कोई बड़ा नेता ऐसा रहा हो, जिसने वहां अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो। जिनको कर्नाटक में कोई ठीक से जानता पहचानता नहीं था, वह भी विजेता भाव के प्रदर्शन में पीछे नहीं थे।

मायावती के झटके के बाद क्या होगा महागठबंधन का भविष्य?

मायावती जानती हैं कि गठबन्धन की बात विकल्पहीनता की स्थिति  के कारण चल रही है। यदि सपा कमजोर नहीं होती तो आज भी बुआ के संबोधन में तंज ही होता। ऐसे में मायावती गठबन्धन नहीं सौदा करना चाहती हैं। गोरखपुर और फूलपुर में भी उन्होंने समझौता ही किया था। उन्होंने शर्तो के साथ ही समर्थन दिया था। इसमें उच्च सदन के लिए समर्थन की शर्त लगाई गई थी। लेकिन अखिलेश मायावती की शर्त को पूरा नहीं कर पाए थे।

गिरने से अच्छा है कि ठोकर खाकर संभल जाइए, मायावती जी !

बसपा और सपा का घोषित सियासी सौदा फिलहाल तात्कालिक था। इसमें लोकसभा के दो और राज्यसभा की एक सीट को शामिल किया गया था। इस सौदे में सपा को शत-प्रतिशत मुनाफा हुआ। उसके लोकसभा व राज्यसभा के तीनों उम्मीदवार विजयी रहे। लेकिन, बसपा खाली हाँथ रही। एक दूसरे पर कितना विश्वास था, यह मायावती के बयान से ही जाहिर था। मायावती ने कहा था कि राज्यसभा में उनके एजेंट को वोट