पद्मावती प्रकरण : अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को भूलते जा रहे फिल्मकार

आज सिनेमा, शिक्षण व मनोरंजन के उद्देश्यों से मुंह मोड़ कर प्रोपगंडा की शक्ल में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। उत्तेजनापूर्ण संवाद, आइटम सोंग और नायिकाओं को निर्वस्त्र करने की होड़ में फिल्मकार समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का कैसा निर्वाह कर रहे हैं, यह समझ से परे है?  बहरहाल, सामाजिक दायित्वों से मुख मोड़ रहे और सुनियोजित तरीके से बहुसंख्यकों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले फिल्मकार समय रहते सचेत हो जाएं तो बेहतर, अन्यथा इसका खामियाजा समाज के साथ-साथ उन्हें भी भुगतने को तैयार रहना चाहिए।

प्रिय प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी

यदि आप हमें आदेश करें

तो प्रेम का हम श्री गणेश करें

ये चक्षु तेरे चंचल-चंचल

यह कुंतल भी श्यामल-श्यामल 

यह अधर धरे जीवन ज्वाला

ये रूप चंद्र शीतल-शीतल

ओ कामिनी, ओ कामिनी

प्रेम विशेष करें, यदि आप.. 

यह गाने के बोल साल 1971 में रिलीज हुई हिंदी फिल्म ”हम तुम और वो” के हैं।  गीत के बोल लिखे थे वर्मा मलिक ने। फिल्म रिलीज होने पर कई लोगों ने इस गीत का मजाक उड़ाया। गीत को क्लिष्ट हिंदी और आम दर्शकों की समझ में न आने वाला बताया। कुछ लोगों ने गाने को गंभीर के बजाय हास्य की श्रेणी में रख दिया। अब साल 1985 में रिलीज हुई फिल्म “गुलाम” के गीत के बोल पर नजर डालिए-

जिहाल-ए-मिस्की़ं मकुन ब रंजिश

ब हाल-ए-हिज्रा बेचारा दिल है

सुनाई देती है जिसकी धड़कन

तुम्हारा दिल या हमारा दिल है

गीतकार गुलजार ने इस गीत को अमीर खुसरो की एक सूफियाना रचना से उधार लिया था। अमीर खुसरो ने इस रचना की एक लाइन फारसी में और एक लाइन बृज भाषा में लिखी थी। “गुलाम” फिल्म के इस गाने की शुरुआती पंक्तियां कितने लोगों के समझ में आई होंगी इसका अनुमान लगाने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मगर आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि “गुलाम” के इस गाने को “हम तुम और वो” के गीत की तरह आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ा और ना ही कोई बहस हुई।

दरअसल, स्वतंत्रता से पूर्व मुगलों व अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति, परंपराओं व मान-मर्यादाओं को तहस-नहस करने और उनके प्रति हीनता की भावना पैदा करने का सतत अभियान छेड़े रखा। भारतीय सिनेमा के जन्म लेने के बाद फिल्मकारों के एक वर्ग ने मुगलों व अंग्रेजों की परंपरा को सिनेमा के माध्यम से आगे बढ़ाया। भारतीय सिनेमा का इतिहास ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब फिल्मों के माध्यम से हिंदुओं की आस्था पर प्रहार करने के दुष्प्रयास किए गए। इतिहास का भद्दा रूपांतरण, वीर व प्रेरणादायी व्यक्तित्वों का अपमान, हिंदू देवी-देवताओं और प्रतीकों का भौंडा चित्रण लगातार किया जाता रहा है।

हिंदुओं की उदारता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व मनोरंजन के नाम पर बहुसंख्यक वर्ग को उपहास का पात्र बनाया जाता रहा है। ऐसी तमाम फिल्में मिल जाएंगी, जिनमें लंबी चोटी रखे हुए हिंदू पुजारी नकारात्मक भूमिका में दिखता है। ऐसी फ़िल्में कम हैं, जिसके कथानक में किसी मौलवी या फादर की भूमिका हो। क्या किसी फिल्मकार की ऐसी मजाल हो सकती है कि वह अपनी फिल्म में किसी मौलवी या फादर का नेगेटिव किरदार दिखाए?

सांकेतिक चित्र

वर्तमान में विवादों से घिरी संजय लीला भंसाली की “पद्मावती” का ही उदाहरण लें।  भंसाली को कैसे अनुमति दी जा सकती है कि वह इतिहास के नाम पर धंधा करने वाले वामपंथी इतिहासकारों के कुकृत्य की आड़ में गौरवशाली राजपूत परंपरा की वीरांगना रानी पद्मावती के चरित्र से खिलवाड़ करें? फिल्म का सामने आना अभी बाकी है। मगर फिल्म को लेकर जो आरोप लग रहे हैं और जो आशंकाएं व्यक्ति की जा रही है, उनमें अगर थोड़ा भी दम है, तो फिल्म को क्यों रिलीज होने देना चाहिए?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के झंडाबरदार तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी फिल्म के समर्थन में रानी पद्मावती के अस्तित्व को नकार रहे हैं। थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाए कि रानी पद्मावती इतिहास की एक काल्पनिक पात्र है, तो भी उनकी गौरव-गाथा वर्षों-वर्षों से देश के बहुसंख्यक लोगों की प्रेरणा का स्रोत है। समाज के सारे मानक वास्तविकता व तथ्यों के आधार पर ही निर्धारित नहीं होते  हैं। आस्था व विश्वास से भी समाज में मान्यताएं निर्धारित होती हैं। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हिंदू मान-मर्यादाओं व प्रतीकों से क्यों हमेशा छेड़-छाड़ होती है? इन दिनों वामपंथी कवि व फ़िल्म निर्देशक सनल कुमार शशिधरण की मलयालम फिल्म “सेक्सी दुर्गा (विरोध के बाद परिवर्तित नाम ‘एस दुर्गा’)” को लेकर भी लगातार विवाद चल रहा है। यह फिल्म समाज में स्त्री-पुरुष में भेदभाव के कथानक पर आधारित है। यह सही है कि समाज में पुरुष-स्त्री में भेदभाव नहीं होना चाहिए। मगर फिल्मकार को फिल्म की किरदार दुर्गा के नाम के साथ देवी दुर्गा के नाम को जोड़ने की क्यों जरूरत पड़ी? केरल के पितृ सत्तात्मक समाज की कहानी पर आधारित इस फिल्म का नाम “सेक्सी दुर्गा” रखने वाले फिल्म निर्देशक में क्या इतनी हिम्मत है कि वह देश में मुस्लिम महिलाओं के तलाक, बुर्का प्रथा, बहुविवाह आदि के नाम पर हो रहे शोषण पर फिल्म बना सकें? 

इस क्रम में “पीके” फिल्म की चर्चा करना सामयिक होगा।  फिल्म में बहुसंख्यक हिंदुओं के देवी-देवताओं का मनोरंजन के नाम पर जैसा मजाक उड़ाया गया है, वैसा मजाक अन्य धर्मावलंबियों के साथ किया गया होता तो आमिर खान आज फतवों के डर से कहीं अज्ञातवास गुजार रहे होते।  फिल्म “बाजीराव मस्तानी” को ही देखिये। फिल्मकार ने बाजीराव जैसे वीर योद्धा को प्रेम के विरह में पागल होकर तड़पता दिखाकर न केवल एक वीर नायक के चरित्र को कलंकित किया है, अपितु इतिहास से भी खिलवाड़ किया है। 

इसमें दो राय नहीं हो सकती कि एक शतक से अधिक का समय पूरा कर चुके भारतीय सिनेमा ने फिल्मों के माध्यम से सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक सरोकारों को प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिंदी फिल्मों में मनोरंजन के साथ-साथ भारतीय जीवन के विविध पहलुओं को बदलते परिवेश में चित्रित करने में सफलता भी हासिल हुई। कई फिल्मकारों ने आजादी के आंदोलन के दौरान स्वतंत्रता संग्राम व राष्ट्रभक्ति के कथानक को अपनी फिल्मों में जगह दी। ऐसे फिल्मकारों ने इस माध्यम की सशक्तता को महसूस किया और फिल्मों के द्वारा अपने सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्धता दिखाई।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसे प्रतिबद्ध लोग रहे हैं, जिन्होंने फिल्मों को कला व सामाजिक सरोकारों का माध्यम माना है। मगर धीरे-धीरे फिल्मों का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन परोसकर पैंसे कमाने तक सिमटता जा रहा है। फिल्मकार अपनी सामाजिक प्रतिबद्धता को भूलते जा रहे हैं। अधिकांश फिल्मकार यह भूल गए हैं कि साहित्य की तरह फिल्में भी समाज का दर्पण होती हैं, उन्हें यह भी आभास नहीं रहा कि सिनेमा के कंधों पर देशकाल व सामाजिक दायित्व का दोहरा बोझ है।

आज सिनेमा, शिक्षण व मनोरंजन के उद्देश्यों से मुंह मोड़ कर प्रोपगंडा की शक्ल में आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है। उत्तेजनापूर्ण संवाद, आइटम सोंग और नायिकाओं को निर्वस्त्र करने की होड़ में फिल्मकार समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का कैसा निर्वाह कर रहे हैं, यह समझ से परे है?  बहरहाल, सामाजिक दायित्वों से मुख मोड़ रहे और सुनियोजित तरीके से बहुसंख्यकों की भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले फिल्मकार समय रहते सचेत हो जाएं तो बेहतर, अन्यथा इसका खामियाजा समाज के साथ-साथ उन्हें भी भुगतने को तैयार रहना चाहिए।

(लेखक उत्तराखंड भाजपा के नेता हैं। स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)