सुन लो पाकिस्तान, अब तो मोदी भी बोल दिए ‘वो कश्मीर हमारा है’

इस बात को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब दिल्ली में आयोजित एक संवाद कार्यक्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह लेखकों से ‘विचारधारा और राजनीति’ के मुद्दे पर संवाद कर रहे थे। उस संवाद चर्चा के दौरान एक लेखक ने बेबाकी से पूछा कि राजनीति में विचारधारा के प्रश्न पर आप क्या कहते हैं ? इसके जवाब में शाह ने कहा कि विचारधारा को लेकर हम कोई समझौता नहीं कर सकते हैं। हमारी बुनियाद ही विचारधारा आधारित है और हम उसी पर टिके हैं। जब २ थे तब भी और आज २८२ हैं तब भी। इस संवाद चर्चा को इसलिए कोट कर रहा हूँ क्योंकि कल प्रधानमंत्री मोदी ने सर्वदलीय बैठक में कश्मीर से जुड़ा एक ऐतिहासिक बयान दिया है। पीएम मोदी ने कहा कि हम जब जम्मू-कश्मीर की बात कर रहे हों तो हमें चार भागों की बात करनी चाहिए, जिसमे जम्मू, कश्मीर घाटी, लद्दाख और पाक अधिकृत कश्मीर आता है। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि विदेश मंत्रालय इस दिशा में काम करे कि पाक अधिकृत कश्मीर के हालातों पर विश्व में रह रहे वहां के लोगों से जानकारी जुटाए और इसे दुनिया के सामने रखे। पीएम ने अराजक तत्वों से सख्ती से निपटने की बात भी कही। प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान का अन्तराष्ट्रीय एवं राजनीतिक दोनों स्तरों पर मूल्यांकन किया जा रहा है। उधर टीवी चैनलों के माध्यम से बलूचिस्तान में ‘थैंक्यू मोदी’ के सुर सुनाई देने लगे हैं।

खैर, इस बयान के अन्तराष्ट्रीय मायने जो भी निकल कर आयें लेकिन इसका मूल्यांकन विचारधारा की राजनीति के धरातल से भी किया भी जाना चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी उस विचारधारा वाली राजनीति से उभरे हैं जिसकी बुनियाद रखने में एक बड़े नेता ने ‘अखंड भारत’ का नारा देते हुए कश्मीर की धरती पर खुद को कुर्बान कर दिया था। उनकी याद में आज भी अखंड भारत की विचारधारा वाले करोंड़ों लोगों द्वारा यह नारा बोला जाता है ‘जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है।’ आज प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बयान के बहाने डॉ मुखर्जी द्वारा दी गयी उस कुर्बानी की पृष्ठभूमि में धूमिल पड़ चुके विमर्श को न सिर्फ दोहराया है, बल्कि पुनः परिभाषित भी किया है। दरअसल विचारधारा की राजनीति को केंद्र में रखकर इस बयान को समझना इसलिए भी जरुरी है क्योंकि ‘विचारधारा’ ही राजनीति में विविध राजनीतिक दलों को एक-दूसरे से अलग बनाती है। कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान ने उनको बाकियों से अलग खड़ा किया है। कश्मीरियत को बचाने, हिंसा से सख्ती पूर्वक निपटने और पाकिस्तान को बेनकाब करने की जो घोषित नीति मोदी ने सर्वदलीय बैठक में प्रस्तावित की है, वो वाकई ऐतिहासिक तौर पर उन्हें दूसरों से अलग खड़ा करती है और उस विचारधारा के अत्यंत करीब ले जाती है, जिसकी बुनियाद पचास के दशक के शुरूआती दिनों में ‘जनसंघ’ की स्थापना के दौरान रखी गयी थी।

प्रधानमंत्री मोदी के इस बयान के अन्तराष्ट्रीय मायने जो भी निकल कर आयें, लेकिन इसका मूल्यांकन विचारधारा की राजनीति के धरातल से भी किया भी जाना चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि मोदी उस विचारधारा वाली राजनीति से उभरे हैं, जिसकी बुनियाद रखने में एक बड़े नेता ने ‘अखंड भारत’ का नारा देते हुए कश्मीर की धरती पर खुद को कुर्बान कर दिया था। उनकी याद में आज भी अखंड भारत की विचारधारा वाले करोंड़ों लोगों द्वारा यह नारा बोला जाता है ‘जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है।’ आज प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बयान के बहाने डॉ मुखर्जी द्वारा दी गयी उस कुर्बानी की पृष्ठभूमि में धूमिल पड़ चुके विमर्श को न सिर्फ दोहराया है, बल्कि उसे पुनः परिभाषित भी किया है।

चूँकि तुष्टिकरण की राजनीति और कश्मीर पर ढुलमूल रवैया देश ने दशकों तक देखा है, लिहाजा मोदी के इस बयान को ऐतिहासिक भी कहा जा सकता है. अभी तक तमाम बुद्धिजीवी यह प्रश्न खड़ा करते रहे थे और तमाम राष्ट्रवादी भी इस सवाल पर भ्रम की स्थिति में थे कि कश्मीर मुद्दे पर भाजपा की नीति क्या है ? निश्चित तौर पर यह सवाल वाजिब तो था ही, और उठता भी रहा। पीडीपी के साथ गठबंधन में आने के बाद यह सवाल राष्ट्रवादियों के बीच भी मुखर होने लगा था। शायद मोदी के इस ‘दो टूक’ के बाद इस सवाल पर विराम लग जाए और अब लोग इस बात को समझ लें कि कश्मीर को लेकर भाजपा-नीत केंद्र सरकार अपनी उसी विचारधारा के साथ आगे बढ़ रही है, जो उसके मूल एजेंडे का हिस्सा है। इस बयान के बहाने प्रधानमंत्री ने उन लोगों को भी सख्त सन्देश दे दिया है जो दिल्ली में बैठकर ‘आजादी-आजादी’ का विलाप करते हैं। दरअसल अलगाववादी सोच से पोषित इन लोगों के लिए अब भ्रम यह है कि वो पाक अधिकृत कश्मीर वाली उस ‘आजादी’ पर क्या बोलें, जिसकी तरफ मोदी ने दुनिया का ध्यान दिलाने की बात कही है। पाक अधिकृत कश्मीर की आजादी के मसले पर इन अलगाववादी ताकतों की चुप्पी यह बताती है कि ये पाकिस्तान द्वारा पोषित लोग हैं, जिनके मानवाधिकार की लड़ाई का दायरा बेहद चयनित है।

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सर्वदलीय बैठक (साभार: गूगल)

मोदी के बयान के बाद अब बहस व्यापक हो गयी है। अब बहस इसपर है कि पाक अधिकृत कश्मीर पर बात हो। उसको वापस भारत में मिलाने पर बात हो। बलूचिस्तान की आजादी को बल मिले। हालांकि इस बयान के बाद पाकिस्तान की बौखलाहट तो स्वाभाविक है ही साथ ही भारत में बैठे अलगाववादी एवं उनके सहानुभूति में खुद को समर्पित कर कुछ तथाकथित मुट्ठीभर बुद्धिजीवियों की छटपटाहट देखी जा सकती है। देसज भाषा में कहें तो मोदी ने इन अलगाववादी मानसिकता वालों की छाती पर मूंग दल दिया है। अब बहस सिर्फ घाटी की नहीं, बल्कि अब बहस पाक अधिकृत क्षेत्रों पर भी होगी। अब बहस बलूचिस्तान की आजादी पर भी होगी। खैर, यह बहस निकली है तो दूर तलक जायेगी और इस बहस के बहाने न सिर्फ पाकिस्तान बेनकाब होगा बल्कि भारत में बैठे भी कुछ लोग बेनकाब होंगे। इस बयान के बहाने सिर्फ इतिहास नहीं बल्कि ‘भूगोल’ भी बदलने की गुंजाइश तलाशी जा सकती है।

लेखक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी फाउंडेशन में रिसर्च फेलो हैं एवं नेशनलिस्ट ऑनलाइन के एडिटर हैं।