स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतरी की उम्मीद जगाती राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति

वर्ष 2014 में सत्तारूढ़ होने के बाद मोदी सरकार द्वारा नयी स्वास्थ्य नीति को लेकर कवायदे शुरू की गयीं। नयी स्वास्थ्य नीति का एक प्रारूप लोगों की राय जानने के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया। उसपर तमाम लोगों के सुझाव आए जिनका मिला-जुला रूप आज राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के रूप में देश के सामने आया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति को सरकार के केन्द्रीय मंत्रिमंडल से मंजूरी मिल गयी है। इससे पूर्व देश में सन 2002 की स्वास्थ्य नीति चल रही थी।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति – 2017 के तहत लोगों को सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों में भी इलाज करवाने में छूट मिलेगी। स्वास्थ्य बीमा योजना के जरिये निजी अस्पतालों को एक निश्चित रक़म देकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी मरीज़ को आर्थिक अभाव में इलाज से वंचित न होना पड़े। साथ ही, जिला अस्पतालों व उससे ऊपर के सभी अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के तहत चलाने का प्रस्ताव भी इस नयी नीति में किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सरकार द्वारा नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए समय की आवश्यकताओं के अनुरूप और ठोस अध्ययन पर आधारित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लायी गयी है।

खैर, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 कई मायनों में अत्यंत महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी प्रतीत होती है। दरअसल 2002 से 2017 के इन पंद्रह वर्षों में देश के स्वास्थ्य क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक, प्रोद्योगिकीय  और महामारी-विज्ञान से सम्बद्ध चुनातियों में व्यापक बदलाव आया है। इस कारण 2002 की स्वास्थ्य नीति उन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम नहीं रह गयी थी। लेकिन, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2017 के प्रावधान इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किये गए हैं, जिससे कि इस नयी नीति के जरिये स्वास्थ्य क्षेत्र की समस्त चुनौतियों का मजबूती से सामना किया जा सके।

इस नीति का प्रमुख उद्देश्य देश के समस्त नागरिकों विशेषकर जो आर्थिक अभाव में अल्पसेवित व उपेक्षित हैं, को समुचित स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराते हुए उनके स्वास्थ्य की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इस नीति के जरिये सरकार की कोशिश ऐसी व्यवस्था बनाने की है कि देश के नागरिक बिना आर्थिक कठिनाइयों का अनुभव किए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त कर सकें। इस नीति के लक्ष्यों पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालें तो 2025 तक जीवन-प्रत्याशा को औसतन 67.5 वर्ष से बढ़ाकर सत्तर वर्ष करने; कुल प्रजनन दर को घटाकर 2.1 प्रतिशत पर लाने; नवजात शिशु मृत्युदर और पांच वर्ष से से कम आयु के बच्चों के मृत्युदर में कमी लाने जैसे लक्ष्य भी इस नीति में निर्धारित किए गए हैं। वर्ष 2017 के अंत तक कालाजार व फाइलेरियासिस तथा वर्ष 2018 तक कुष्ठ रोग को समाप्त करने का भी लक्ष्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में शामिल है। इसके अतिरिक्त क्षयरोग, मधुमेह, हृदयरोग, आदि बीमारियों को भी समाप्त करने या कम करने का लक्ष्य इस नीति में रखा गया है। मुख्यतः नयी स्वास्थ्य नीति रुग्णता-निवारण की बजाय आरोग्यता पर बल देने वाली है। इसके लक्ष्यों की पूर्ती हेतु वित्तीय प्रबंधन के लिए जन स्वास्थ्य व्यय जो अभी सकल घरेलू उत्पाद का 1.04 प्रतिशत है, को समयबद्ध ढंग से बढ़ाते हुए 2.5 प्रतिशत तक ले जाने का भी लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

अबतक सरकारी नीतियाँ प्रायः सरकारी महकमों पर लागू होती थीं, लेकिन इस नीति की विशेषता यह है कि इसके तहत लोगों को सरकारी अस्पतालों के साथ-साथ निजी अस्पतालों में भी इलाज करवाने में छूट मिलेगी। स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत निजी अस्पतालों को एक निश्चित रक़म देकर यह सुनिश्चित किया जाएगा कि किसी भी मरीज़ को आर्थिक अभाव में इलाज से वंचित न होना पड़े। साथ ही, जिला अस्पतालों व उससे ऊपर के सभी अस्पतालों को पीपीपी मॉडल के तहत चलाने का प्रस्ताव भी इस नयी नीति में किया गया है। इस प्रकार स्पष्ट है कि सरकार द्वारा नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए समय की आवश्यकताओं के अनुरूप और ठोस अध्ययन पर आधारित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति लायी गयी है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)