‘नागरिकता संशोधन विधेयक पर तथ्यों से हीन विपक्ष केवल हिन्दूफोबिया फैला रहा है’

लोक सभा के बाद इस बिल को राज्य सभा में पारित करवाने का जिम्मा गृह मंत्री अमित शाह के कन्धों पर था, जिसको उन्हों बखूबी निभाया भी। राज्य सभा में यह बिल एक लम्बी बहस के बाद पारित हो गया, बिल के पक्ष में 125 और विपक्ष में 99 मत पड़े लेकिन विपक्ष तथ्यों के बजाय हिन्दूफोबिया फ़ैलाने का काम ज्यादा कर रहा है। गृह मंत्री ने अपने एक-एक जवाब से न केवल विपक्ष के सारे वार खाली कर दिए बल्कि उन्हें आईना भी दिखाया।

भारत में आज एक वर्ग ऐसा है जो सवाल उठा रहा है कि धर्म के आधार पर नागरिकता क्यों दी जा रही है। सवाल है कि क्या इससे मुसलमानों को खतरा पैदा होगा? क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाएगा? जवाब एक ही है – नहीं। नागरिकता संशोधन विधेयक एक ऐसा विषय है जिसको लेकर भ्रांतियां ज्यादा फैलाई गई हैं। विपक्ष इसको एक ऐसे मुद्दे के तौर पर पेश करना चाह रहा था कि यह देश के मुसलमानों के विरुद्ध है और वे इसके खिलाफ हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि इस बिल का भारत के मुसलमानों से कोई लेना देना ही नहीं है और न ही कोई भी मुस्लिम इसका विरोध कर रहा है।

बिल के अन्दर इस तरह का कोई प्रावधान नहीं कि किसी धर्म, समुदाय या किसी वर्ग के लोगों का हक़ छीना जाय। इस बिल के अन्दर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में प्रताड़ित हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, पारसी आदि समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है। यह वैसे लोग होंगे जो 31 दिसम्बर, 2014 से पहले भारत शरणार्थी के तौर पर आए।

लोक सभा के बाद इस बिल को राज्य सभा में पारित करवाने का जिम्मा गृह मंत्री अमित शाह के कंधे पर था, जिसको उन्हों बखूबी निभाया भी। राज्य सभा में यह बिल एक लम्बी बहस के बाद पारित हो गया, बिल के पक्ष में 125 और विपक्ष में 99 मत पड़े लेकिन विपक्ष तथ्यों के बजाय हिन्दूफोबिया फ़ैलाने का काम ज्यादा कर रहा है।

गृह मंत्री ने अपने एक-एक जवाब से न केवल विपक्ष के सारे वार खाली कर दिए बल्कि उन्हें आईना भी दिखाया। बिल पारित होने के बाद सोनिया गांधी का एक पत्र सामने आया जिसमें उन्होंने इस दिन को लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया है। कह सकते हैं कि विपक्ष अपनी सत्तालोलुप राजनीति के चक्कर में सही-गलत का विवेक भी खो चुका है। 

देखा जाए तो भारत में सालों से वैसे हिन्दू और सिख धर्म से जुड़े शरणार्थी रह रहे हैं, जिन्हें धार्मिक आधार पर पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में प्रताड़ित किया गया, उनके लिए भारत में शरण लेने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है, क्योंकि उनके साथ जब धार्मिक आधार पर इन देशों में भेदभाव किया गया तो इसका हल भी धार्मिक पहचान को लेकर ही निकाला जाना था।

इन तीनों देशों में हिन्दू और सिख, ईसाई, जैनी और पारसी अल्पसंख्यक हैं, जहाँ धार्मिक पहचान के आधार पर उनके ऊपर जुल्म किये जाते रहे हैं। क्या भारत सिर्फ़ इसी आधार पर इनके साथ भेदभाव करता रहे कि ये उनके वोट बैंक नहीं हैं, इसलिए उनके बारे में सोचा नहीं जाएगा। नरेन्द्र मोदी सरकार ने नागरिकता संशोधन बिल के अन्दर ये कदम इसलिए नहीं उठाया कि इससे किसी किस्म का चुनावी फायदा होगा जबकि वास्तव में देश को इसकी लम्बे समय से जरूरत थी।

वहीं केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद विपक्ष की तरफ से इस तरह के प्रयास किये गए कि अन्य समुदायों में हिन्दू समुदाय के खिलाफ भय फैलाया जाय, हिन्दू-फोबिया का माहौल बनाया जाय। नागरिकता संशोधन बिल के सम्बन्ध में भी विपक्ष के प्रयास इसी दिशा में रहे हैं।

इस बिल का विरोध करने वाले ज़्यादातर लोग वैसे हैं जो पाकिस्तान-बांग्लादेश आदि देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति को पूरे तौर पर नज़रअंदाज़ कर देश के मुस्लिम समुदाय का तुष्टिकरण कर अपने वोट बैंक को पक्का करने की मंशा रखते आए हैं। सिर्फ यही नहीं, इससे पूर्व भी तीन तलाक, अनुच्छेद-370 और अयोध्या समेत तमाम मुद्दों पर इन लोगों की ऐसी ही राय रही है, लेकिन इन सब मामलों को सरकार ने बखूबी संभाला है। अब सरकार को असम सहित पूरे उत्तर पूर्व में नागरिकता बिल की मूल अवधारणा के बारे में व्याप्त तकनीकियों को बेहतर तौर पर समझाने की जरूरत है ताकि अनावश्यक हिंसा की सम्भावना से बचा जा सके।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)