पूर्व फौजी की आत्महत्या पर अपनी घटिया राजनीति से बाज आएं विपक्षी!

पिछले दो साल से चल रहा असहिष्णुता का नाटक इस देश में कब समय की गर्त में समा गया, किसी को पता भी नहीं चला, पर चंद एसी स्टूडियो की कुर्सियों पर बैठे प्रवंचक बुद्धिजीवियों  की कॉफी के प्यालों में उठा तूफान इस देश का असली मिजाज नहीं दिखाता। यह देश इन बौद्धिकों के झूठ-फरेब को बहुत मुद्दत और शिद्दत से पहचान गया है, इसलिए उन पर ध्यान भी नहीं देता।

जो भी इस देश में ऐसे प्रवंचक और पाक-प्रेमी बुद्धिजीवी हैं, वे अपने टीवी स्टूडियो में जब उड़ी से लेकर पाक की दोस्ती तक चीख-पुकार मचाए थे, तो बिहार के एक ज़िले में गांववालों ने चंद पाक एजेंटों की जमकर धुलाई की और उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया। इन तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह समझना चाहिए कि देश के गांव-जवार में ‘ए माई बलूचिस्तान के अब भारत में मिलवा दे’ से लेकर ’कश्मीर नहीं पाकिस्तान चाहिए, पूरा अखंड हिंदुस्तान चाहिए’ की धुन पर गाने बज रहे हैं और लोग झूम रहे हैं। बहरहाल, बिहार में जब इसी तरह के गाने बज रहे थे, तो 15-20 लोगों ने (ज़ाहिर तौर पर समुदाय विशेष के) पाकिस्तान ज़िंदाबाद के नारे लगाए जिसके फलस्वरूप उनको गांववालों ने ही धर दबोचा।

ऐसे ही, भोपाल एनकाउंटर में मारे गए आतंकियों की शवयात्रा में शामिल लोगों ने जब पुलिस पर पत्थर फेंकने और लाठियां भांजनी शुरू कीं, तो वहां की कलेक्टर स्वाति मीणा खुद लाठी लेकर उन गुंडों से भिड़ गयीं, उन्हें खदेड़ दिया।

यह महज दो उदाहरण हैं प्रवंचक बुद्धिजीवियों को बताने के लिए कि उनकी चीख-पुकार से देश में पत्ता भी नहीं खड़कता। पुराने उदाहरण इसलिए यह लेखक नहीं दे रहा कि बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी। खैर, ताज़ा मामला एक पूर्व सैनिक की आत्महत्या और उस पर इन ‘लाश के सौदागरों’ की खुशी और उल्लास का है।

एक फौजी की आत्महत्या निःसंदेह पीड़ादायक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इससे यह कहां तय हो जाता है कि उसकी लाश को भी एक तमाशा बना दिया जाए और सबसे बढ़कर इससे यह कहां तय हो जाता है कि जिस सरकार ने ‘वन रैंक, वन पेंशन’ को वास्तविकता बनाने की पहल की, वह उसकी मौत की ज़िम्मेदार है ? ज़ाहिर है, किसीने रामकिशन को गुमराह किया और उसकी मनोस्थिति का नाजायज उपयोग कर उसे प्रेरित किया इस कदम उठाने के लिए ? यह हत्या है और पुलिस को इसका पता लगाना चाहिए कि रामकिशन की हत्या किसने की ?

यह लेखक उन मृत फौजी के तथ्यों पर बात नहीं करेगा, क्योंकि वह महज छह वर्ष ही फौज में थे, मानसिक तौर पर थोड़ा परेशान भी थे। हालांकि, हमारी यह जानने में जरूर दिलचस्पी है कि अपनी मां के बीमार पड़ने पर जो राहुल गांधी इतनी गोपनीयता बरतते हैं, वह अपने प्रशंसकों की फौज लेकर अस्पताल में कौन सा तमाशा खड़ा करने गए थे ? शर्म तो खैर हर मामले में सियासत ढूढने वाले इन सियासतदानों को क्या आएगी, लेकिन ज़रा राहुल बाबा यह भी बता देते कि सरहद पर मरे कितने फौजियों के घरों पर वह मातमपुर्सी करने गए हैं ? गए हैं तो मोबाइल में आइफोन-7 लेकर निहायत बेहयाई से हंसते हुए वह कौन सा मातम मना रहे थे ? भला हो, आज के ज़माने में फटाफट तस्वीरों को जो राहुल से लेकर सारे सौदागरों के चेहरे तुरंत दिख जाते हैं- बिल्कुल साफ-साफ, अंदर से इनकी खुशी झलकाते कि चलो एक लाश मिली, फिर से सियासत का नंगा नाच करने को।

कल के नाटक के एक और किरदार थे- अरविंद केजरीवाल। इनकी तो खैर, बात ही क्या ? कहना अतिश्यिक्ति नहीं होगी कि अगर इनके बाथरूम का फ्लश भी टूट जाए, तो भी ये मोदी को ही जिम्मेदार ठहरा देंगे। इनके लाइव भाषण के दौरान एक किसान गजेंद्र फंदे से लटक गया, उसकी मौत की तस्दीक के बाद भी ये भाषण देते रहे, ज्ञान बांटते रहे, पर आज इनकी संवेदनशीलता इस कदर उफान पर है कि ये बिना तथ्यों की जांच किए चले गए अस्पताल में अव्यवस्था फैलाने। (हां, ये अलग बात है कि ये निहायत ही अराजक हैं, खुद ही स्वीकार भी चुके हैं)। इसके बाद दिल्ली में व्यवस्था कायम करने के लिए इनको रोका गया, तो प्रधानमंत्री मोदी को हिटलर कहने में वे भला देरी क्यों करते।

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दरअसल, फौजवालों, उनके परिवारों, समाज और आम जनता के बीच प्रधानमंत्री के बढ़ते रुतबे और लोकप्रियता को रोकने के लिए, इन दोनों ही नहीं, सभी विपक्षियों के पास एक फौजी की लाश पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने की मजबूरी तो है ही। इतिहास गवाह है- कांग्रेस, वामपंथी गिरोह ने हमेशा से यही किया है। इससे पहले रोहित वेमुला मामले में इन्होंने यही किया। न केवल उसकी जाति बदली, बल्कि उसकी मौत के बाद उसकी लाश को राजनैतिक तमाशा भी बनाया। अखलाक के साथ इन्होंने यही किया। फिलहाल जेएनयू में नजीब गायब है। सोचके भी डर लगता है कि उसके साथ क्या होगा।

लाशों को लेकर “नंगा नाच” करना ही इनकी फितरत है। एक फौजी की आत्महत्या निःसंदेह पीड़ादायक एवं दुर्भाग्यपूर्ण है। लेकिन इससे यह कहां तय हो जाता है कि उसकी लाश को भी एक तमाशा बना दिया जाए और सबसे बढ़कर इससे यह कहां तय हो जाता है कि जिस सरकार ने ‘वन रैंक, वन पेंशन’ को वास्तविकता बनाने की पहल की, वह उसकी मौत की ज़िम्मेदार है ? ज़ाहिर है, किसीने रामकिशन को गुमराह किया और उसकी मनोस्थिति का नाजायज उपयोग कर उसे प्रेरित किया इस कदम उठाने के लिए ? यह हत्या है और पुलिस को इसका पता लगाना चाहिए कि रामकिशन की हत्या किसने की ?

लाशों पर सियासत करने वाले ये विपक्षी नेता कभी नहीं चाहेंगे कि यह सत्य उजागर हो कि  असल में राम किशन ग्रेवाल को किन परिस्थितियों ने इतना उग्र कर दिया कि उन्होंने अचानक से इतना बड़ा निर्णय लिया। इसकी न्यायिक जांच कर इसके पीछे का सच ज़रूर सामने लाया जाना चाहिए। हमारे देश में लाश की राजनीति कुछ गिद्धों को रास आ रही है। इन्होंने रोहित की लाश पर राजनीति की, अखलाक पर की, जेएनयू को सुलगाया कुछ इस तरह कि आज इस लेखक को अपने गृह राज्य में यह बताते हुए अजीब नज़रों का सामना करना पड़ता है कि वह जेएनयू का पूर्व छात्र है। छेड़खानी के आरोप में दंड भुगत चुके एक युवक को जब ये वामपंथी-कांग्रेसी अपना पोस्टर ब्वॉय बनाते हैं, तो भूल जाते हैं कि देश केवल जेएनयू तक सीमित नहीं है और समय सबका हिसाब रख रहा है।

(लेखक पेशे से पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)