जयंती विशेष : राष्ट्र के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा सरदार पटेल का व्यक्तित्व

राष्ट्रीय एकता में सरदार पटेल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन दुखद ही है कि पिछली कांग्रेस सरकारों ने उनके इस योगदान को समुचित सम्मान नहीं दिया। खुद ही खुद को भारत रत्न दे डालने वाले कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों को आजादी के बाद लगभग चार दशक तक पटेल को यह सम्मान देने की याद नहीं आई। 1991 में जाकर उन्हें यह सम्मान मिला। लेकिन अच्छी बात है कि अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उनके योगदानों को समुचित सम्मान दिया जा रहा है।

आज देश के प्रथम उप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और आजाद भारत को एकता के सूत्र में बाँधने वाले लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल की 144 वीं जयंती है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के केवड़िया में उनकी विशाल प्रतिमा ‘स्टेचू ऑफ़ यूनिटी’, जिसका अनावरण गत वर्ष ही हुआ था, पर पहुंचकर उन्हें श्रद्धांजलि दी। यहाँ मोदी ने जम्मू-कश्मीर की चर्चा करते हुए कहा कि सरदार पटेल ने कहा था कि अगर ये मामला उनके हाथ में होता जल्दी सुलझ गया होता। साथ ही प्रधानमंत्री ने अनुच्छेद-370 हटाने का जिक्र करते हुए कहा कि इसे हटाकर हमने सरदार पटेल का सपना पूरा किया है।  

वास्तव में, स्वतन्त्रता संग्राम से लेकर मजबूत और एकीकृत भारत के निर्माण तक में सरदार वल्लभ भाई पटेल का  योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनका जीवन, व्यक्तित्व और कृतित्व सदैव प्रेरणा के रूप में देश के सामने रहेगा। उन्होने युवावस्था में ही  राष्ट्र और समाज के लिए अपना जीवन समर्पित करने का निर्णय लिया था। इस ध्येय पथ पर वह निःस्वार्थ भाव से लगे रहे। गीता में भगवान कृष्ण ने कर्म को योग रूप में समझाया है। अर्थात अपनी पूरी कुशलता और क्षमता के साथ दायित्व का निर्वाह करना चाहिए। सरदार पटेल ने आजीवन इसी आदर्श पर अमल किया। जब वह वकील के दायित्व का निर्वाह कर रहे थे, तब उसमें भी उन्होंने मिसाल कायम की।

इस संदर्भ में एक घटना उल्लेखनीय होगी कि एकबार वह जज के सामने जिरह कर रहे थे, तब उन्हें एक टेलीग्राम मिला। उन्होने उसे देखा और चुपचाप जेब मे रख लिया। जिरह जारी रही। जिरह पूरी होने के बाद उन्होंने घर जाने का फैसला लिया। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उस तार में उनकी धर्मपत्नी के निधन की सूचना थी। वस्तुतः यह उनके लौहपुरुष होने का भी उदाहरण है। ऐसा नहीं कि इसका परिचय आजादी के बाद उनके कार्यो से मिला, बल्कि यह दृढ़ता उनके व्यक्तित्व की बड़ी विशेषता थी। जिसका प्रभाव उनके प्रत्येक कार्य में दिखाई देता था।

बचपन मे फोड़े को गर्म सलाख से ठीक करने का प्रसंग भी ऐसा ही था। तब बालक वल्लभ भाई अविचलित बने रहे थे। यह प्रसंग उनके जीवन को समझने में सहायक है। आगे चलकर इसी विशेषता ने उन्हें महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी और कुशल प्रशासक के रूप में प्रतिष्ठित किया।

देश को आजाद करने में उन्होने महत्वपूर्ण योगदान दिया। महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के साथ ही कांग्रेस में एक बड़ा बदलाव आया था। इसकी गतिविधियों का विस्तार सुदूर गांव तक हुआ था। लेकिन इस विचार को व्यापकता के साथ आगे बढ़ाने का श्रेय सरदार पटेल को दिया जा सकता है। उन्हें भारतीय सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की भी गहरी समझ थी। वह जानते थे कि गांवों को शामिल किए बिना स्वतन्त्रता संग्राम को पर्याप्त मजबूती नहीं दी जा सकती। वारदोली सत्याग्रह के माध्यम से उन्होने पूरे देश को इसी बात का सन्देश दिया था।

इसके बाद भारत के गांवों में भी अंग्रेजो के खिलाफ आवाज बुलंद होने लगी थी। देश मे हुए इस जनजागरण में सरदार पटेल की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। इस बात को महात्मा गांधी भी स्वीकार करते थे। सरदार पटेल के विचारों का बहुत सम्मान किया जाता था। उनकी लोकप्रियता भी बहुत थी।

स्टैचू ऑफ़ यूनिटी (साभार : India Today)

स्वतन्त्रता के पहले ही उन्होने भारत को शक्तिशाली बनाने की कल्पना कर ली थी।सरदार पटेल भारत की मूल परिस्थिति को गहराई से समझते थे। वह जानते थे कि जब तक अर्थव्यवस्था में कृषि का योगदान महत्वपूर्ण बना रहेगा, तब तक सन्तुलित विकास होता रहेगा। इसके अलावा गांव से शहरों की ओर पलायन नही होगा। गांव में ही रोजगार के अवसर उपलब्ध होंगे।

आजादी के बाद भारत को एकजुट रखना बड़ी चुनौती थी। अंग्रेज जाते-जाते अपनी कुटिल चाल चल गए थे। साढ़े पांच सौ से ज्यादा देशी रियासतों को वह अपने भविष्य के निर्णय का अधिकार दे गए थे। उनका यह कुटिल आदेश एक षड्यंत्र जैसा था। वह दिखाना चाहते थे कि भारत अपने को एक नहीं रख सकेगा, देश के सामने आजाद होने के तत्काल बाद इतनी रियासतों को एक रखने की चुनौती थी। सरदार पटेल ने बड़ी कुशलता से इस एकीकरण का कार्य सम्पन्न कराया। इसमें भी उनका लौह पुरुष वाला व्यक्तित्व दिखाई देता है।

उन्होने देशी रियासतों की कई श्रेणी बनाई। सभी से बात की। अधिकांश को सहजता से शामिल किया। कुछ के साथ कठोरता दिखानी पड़ी। सेना का सहारा लेने से भी वह पीछे नहीं हटे। मतलब देश की एकता को उन्होने सर्वोच्च माना और उसके लिए किसी भी हद तक जाने को तत्पर दिखे।

आजादी के बाद उन्हें केवल तीन वर्ष देश की सेवा का अवसर मिला। इस अवधि में ही उन्होने बेमिशाल कार्य किये। ईमानदारी और सादगी ऐसी कि निधन के बाद निजी सम्प्पति के नाम पर उनके पास कुछ नहीं था। लेकिन उनके प्रति देश की श्रद्धा और सम्मान का खजाना उतना ही समृद्धशाली था। यह उनकी महानता का प्रमाण है।

राष्ट्रीय एकता में सरदार पटेल के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। लेकिन दुखद ही है कि पिछली कांग्रेस सरकारों ने उनके इस योगदान को समुचित सम्मान नहीं दिया। खुद ही खुद को भारत रत्न दे डालने वाले कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों को आजादी के बाद लगभग चार दशक तक पटेल को यह सम्मान देने की याद नहीं आई। 1991 में जाकर उन्हें यह सम्मान मिला। लेकिन अच्छी बात है कि अब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में उनके योगदानों को समुचित सम्मान दिया जा रहा है।

मोदी सरकार में उनके जन्म जयंती को एकता दिवस के रूप में मनाए जाने की शुरुआत हुई तथा उनकी 182  मीटर की विशाल प्रतिमा स्थापित की गयी जो दुनिया की सबसे बड़ी प्रतिमा है। उनके जन्मदिन को बड़े स्तर पर मनाया जा रहा है। राष्ट्र के ऐसे नायकों का यह सम्मान होना ही चाहिए। सरदार पटेल का व्यक्तित्व और कर्तृत्व राष्ट्र के लिए सदैव प्रेरणादायी रहेगा।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)