ममता बनर्जी

महारैली : साबित हुआ कि विपक्षी दलों के पास मोदी विरोध के सिवा और कोई एजेंडा नहीं है!

कोलकाता की विपक्षी महारैली में कहने को लगभग बीस पार्टियों की भागीदारी हुई, लेकिन इनमें से किसी का भी पश्चिम बंगाल की राजनीति में महत्व नहीं है। रैली का पूरा इंतजाम ममता बनर्जी ने अपने लिए किया था। उन्होंने एक तीर से दो निशाने साधने के प्रयास किया। पहला तो वह अपनी पार्टी का चुनाव प्रचार शुरू करना चाहती थीं। इसके लिए भीड़ जुटाई गई। दूसरा, वह

पूरब से पश्चिम तक भाजपा का बुलंद मंसूबा

विपक्षी महागठबंधन की कवायदों के बीच भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना मंसूबा बुलंद कर लिया है। यह बात भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की पहले कलकत्ता की जनसभा और फिर मेरठ में प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के समापन भाषण से जाहिर हुई। पश्चिम बंगाल में भाजपा, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों को पछाड़ कर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है। मतलब यहाँ पार्टी जमीनी स्तर पर मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत में आ गई है। अमित शाह ने इसी अंदाज में ममता बनर्जी  सरकार पर हमले

ममता बनर्जी की बौखलाहट के पीछे यह भय छिपा है कि कहीं ‘बंगाल का त्रिपुरा’ न हो जाए!

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में मिली प्रचंड जीत के बाद अप्रैल, 2017 में ओड़िसा में हुई भाजपा की  राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में अमित शाह ने एक बयान दिया था, जो तब सुर्ख़ियों में छाया रहा। उत्तर प्रदेश की प्रचंड जीत के उत्सव में झूम रहे भाजपा कार्यकर्ताओं से शाह ने कहा था कि यह जीत बड़ी है, लेकिन यह भाजपा का स्वर्णकाल नहीं है। भाजपा का स्वर्णकाल तब आयेगा

एनआरसी : ‘देश देख रहा है कि विपक्षी दल सरकार के विरोध और देश-विरोध के अंतर को भूल गए हैं’

आज राजनीति प्रायः सत्ता हासिल करने मात्र की नीति बन कर रह गई है, उसका राज्य या फिर उसके नागरिकों के उत्थान से कोई लेना देना नहीं है। कम से कम असम में एनआरसी ड्राफ्ट जारी होने के बाद कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया तो इसी बात को सिद्ध कर रही है। चाहे तृणमूल कांग्रेस हो या सपा, बसपा, जद-एस, तेलुगु देसम या फिर आम आदमी पार्टी।

2005 में घुसपैठियों का विरोध करने वाली ममता आज उनकी हितैषी क्यों बन रही हैं?

इन दिनों आसाम में एनआरसी यानी नेशनल रजिस्‍टर ऑफ सिटीजन का मुद्दा उछल रहा है। इसके बहुत विस्‍तार में न जाते हुए सरल रूप में  इतना ही समझा जा सकता है कि असम में 40 लाख लोग ऐसे रह रहे हैं जो कि भारतीय नागरिकता प्राप्‍त नहीं हैं। इस लिहाज से वे घुसपैठियों के दर्जे में आते हैं। ये लोग बांग्‍लादेशी मूल के हैं। आसाम में इनकी बड़ी आबादी निवासरत है। अब

‘जो समझौता लागू करने की हिम्मत राजीव गांधी नहीं दिखा सके, उसे मोदी सरकार ने लागू किया है’

असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) के दूसरे  मसौदे को जारी कर दिया गया है। एनआरसी में शामिल होने के लिए आवेदन किए 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों के नाम शामिल हैं और इसमें 40 लाख लोगों के नाम नहीं हैं। असम सरकार का कहना है कि जिनके नाम रजिस्टर में नहीं है, उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए एक महीने का समय दिया जाएगा।

एनआरसी पर बौखलाने वाले वही लोग हैं, जिन्हें देशहित से अधिक अपना वोट बैंक प्यारा है!

एनआरसी का ड्राफ्ट आज संसद से सड़क तक चर्चा का केंद्रबिंदु बना हुआ है। सभी विपक्षी दल इस मुद्दे पर जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहें हैं, वहीं सत्तारूढ़ भाजपा का स्पष्ट कहना है कि घुसपैठियों के मसले पर सभी दलों को अपना मत स्पष्ट करना चाहिए। देश की सुरक्षा के साथ भाजपा कोई समझौता नहीं करेगी, लेकिन इसे देश का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि भाजपा को

एनआरसी प्रकरण : वोट बैंक के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़ करने पर तुले हैं विपक्षी दल

असम के राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर प्रसंग पर संसद में हंगामा हतप्रभ करने वाला है। आंतरिक सुरक्षा से जुड़े इस मुद्दे पर तो राष्ट्रीय सहमति दिखनी चाहिए थी, जबकि इसमें सभी छुटे भारतीयों का नाम दर्ज होने तय है। लेकिन कुछ लोगों के लिए यह आंतरिक सुरक्षा की जगह  सियासत का मुद्दा है। जनगणना रजिस्टर पर भारत के नागरिकों के लिए कोई कठिनाई ही नहीं है।

अगर वाकई में कहीं लोकतंत्र खतरे में है, तो वो है बंगाल में !

हर दिन देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग मोदी सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगाता है कि वर्तमान सरकार में  लोकतंत्र खतरे में आ चुका है, लेकिन यही बुद्धिजीवी वर्ग कांग्रेस द्वारा न्यायपालिका, चुनाव आयोग को निशाना बनाने  पर चुप्पी साध लेता है। इस बुद्धिजीवी वर्ग के बारे में तो जितना कहा जाए उतना कम है, लेकिन अगर वास्तव में कहीं लोकतंत्र खतरे में है, तो वो है बंगाल में।

क्या ममता के राज में भाजपा का कार्यकर्ता होना भी गुनाह हो गया है ?

पश्चिम बंगाल में इन दिनों राजनीतिक अराजकता चरम पर है। यह अराजकता इसलिए है, क्‍योंकि वहाँ बीते दिनों दो भाजपा कार्यकर्ताओं की दुर्दांत हत्‍या हुई, लेकिन आश्‍चर्य की बात है कि इन दोनों हत्‍याओं पर बुद्धिजीवियों का दिल नहीं पसीजा है। शायद इसकी वजह ये है कि ये दोनों कार्यकर्ता भाजपा के थे। पहली हत्‍या एक जून को पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में हुई।