सोनिया गांधी

संकट के समय भी चुनावी राजनीति में उलझी है कांग्रेस

आजादी के बाद से ही कांग्रेसी सरकारें गरीबों के कल्‍याण का नारा लगाकर अपनी और अमीरों की तिजोरी भरती रही हैं। यही कारण है कि बिजली, पानी, अस्‍पताल, सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं आम आदमी की पहुंच से दूर रहीं।

आपदा की इस घड़ी में तो अपनी वोटबैंक की संकीर्ण राजनीति से बाज आए कांग्रेस!

घर लौट रहे मजदूरों को किराया देने की घोषणा कर वाहवाही लूटने का उतावलापन दिखाने वाली कांग्रेस की अंतरिम अध्‍यक्षा सोनिया गांधी को पहले यह बताना चाहिए कि केंद्र व राज्‍यों में पचास साल तक कांग्रेस के एकछत्र शासन के बावजूद देश का संतुलित विकास क्‍यों नहीं हुआ?

‘जब पूरा देश कोरोना के खिलाफ लड़ रहा, तब कांग्रेस केंद्र सरकार से लड़ रही है’

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस गंभीर वैचारिक द्वंद्व में फंस चुकी है। अनुच्छेद-370 समाप्‍त करने, नागरिकता कानून और राष्‍ट्रीय नागरिकता रजिस्‍टर (एनआरसी) पर तो उसके नेताओं में परस्पर विरोध था ही, अब कोरोना संकट में भी पार्टी के अंतर्विरोध उभरकर सामने आ रहे हैं।

नेहरू-गांधी परिवार के चंगुल से निकले बिना कांग्रेस का उद्धार नहीं हो सकता

पिछले कुछ समय से कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कौन है, ये बहुत से लोगों को ठीक से पता भी नहीं होगा। लोकसभा चुनाव के नतीजों ने कांग्रेस पार्टी को इतना हिला दिया कि तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कुछ समय के लिए अज्ञातवास पर ही चले गए, वापस आये तो इस इरादे के साथ कि वह कभी दोबारा कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बनेंगे।  

कांग्रेस में बढ़ता ही जा रहा परिवारवादी राजनीति का वर्चस्व

ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के कांग्रेस पार्टी छोड़ भाजपा में आने से साबित हो गया कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी परिवारवाद से बाहर निकलने को तैयार नहीं है। वैसे तो  ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया की उपेक्षा के कई कारण हैं लेकिन सबसे अहम कारण है, कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी के लिए रास्ता साफ़ रखना।

नागरिकता संशोधन क़ानून : अफवाहों के जरिए खोई हुई राजनीतिक जमीन तलाशते विपक्षी दल

दिल्‍ली के रामलीला मैदान की रैली वैसे तो दिल्‍ली की 1731 अनधिकृत कालोनियों के 40 लाख निवासियों को मालिकाना हक देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्‍यवाद देने हेतु आयोजित की गई थी लेकिन इस अवसर पर प्रधानमंत्री ने विरोधियों की जमकर खबर ली। उन्‍होंने कहा तुष्‍टीकरण और वोट बैंक की राजनीति करने वाले अफवाहों के जरिए अपनी खोई हुई राजनीतिक

तथ्य बताते हैं कि गांधी परिवार के लिए एसपीजी सुरक्षा से अधिक ‘स्टेटस सिंबल’ ही थी

देश में सामाजिक और आर्थिक के साथ-साथ राजनीतिक सुधार का भी दौर चल रहा है। एक बार फिर इसकी मिसाल पेश करते हुए मोदी सरकार ने राज्यसभा और लोकसभा में एसपीजी बिल पास कर दिया। संभवतः आप सोच रहे होंगे कि आखिर एसपीजी बिल और राजनीतिक सुधारों का क्या मेल! दरअसल पिछले करीब तीन दशक में देश में गांधी परिवार (सोनिया, राहुल और प्रियंका) ने एसपीजी सुरक्षा को एक स्टेटस सिंबल बना लिया था

कांग्रेस आलाकमान के लिए शुभ संकेत नहीं हैं हरियाणा-महाराष्ट्र के चुनावी नतीजे

2014 के लोक सभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद से ही कांग्रेस हाईकमान के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गईं थी लेकिन चाटुकार संस्‍कृति के हावी होने के कारण विरोध की आवाज दब गई। जिन नेताओं ने बागी तेवर दिखाया उन्‍हें बाहर का रास्‍ता दिखा दिया गया। इसके बाद कई राज्‍यों में कांग्रेस को करारी हार का सामना पड़ा लेकिन हाईकमान संस्‍कृति के खिलाफ बोलने का दुस्साहस बहुत कम कांग्रेसियों ने दिखाया।

सिमटते दायरे के बावजूद आत्‍ममंथन से कतराती कांग्रेस

कांग्रेस पार्टी आज अपने अस्‍तित्‍व के लिए संघर्ष कर रही है। 2017 में जब राहुल गांधी कांग्रेस अध्‍यक्ष बने थे तब देश को उम्‍मीद थी कि अब कांग्रेस में एक नए युग का सूत्रपात होगा और पार्टी पुरानी सोच से आगे बढ़ेगी। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली करारी शिकस्‍त के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष पद से त्‍यागपत्र दे दिया

हरियाणा-महाराष्ट्र चुनाव : नेतृत्व से लेकर संगठन तक बदहाली से जूझती कांग्रेस

हरियाणा कांग्रेस चौराहे पर खड़ी है। जैसे-जैसे मतदान की तारीख करीब आ रही है, पार्टी में और अधिक खामियां व अंतर्कलह सतह पर आ रही है।  हरियाणा कांग्रेस के पूर्व प्रमुख अशोक तंवर ने पार्टी छोड़ने की घोषणा कर दी है। इस्तीफे के बाद उन्होंने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर कई गंभीर सवाल उठाए। उनके इस रुख से कांग्रेस पार्टी की रही सही उम्मीदों को पलीता लग सकता है।