चंडीगढ़ निकाय चुनाव : भाजपा की चली आंधी, जनता ने दिखाया विपक्षी दलों को आईना

हाल ही में पंजाब की राजधानी चंडीगढ़ में निकाय चुनावों के परिणाम आये। इन चुनावों में जनता ने भाजपा को ऐतिहासिक रूप से विजयी बनाया है। चंडीगढ़ निकाय के कुल 26 वार्डों में से 22 वार्डों में भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें से 20 में उसे जोरदार जीत हासिल हुई है। भाजपा की सहयोगी शिरोमणि अकाली दल को सिर्फ एक सीट हाथ लगी, वहीँ पिछली बार के चुनावों में ११ सीटें जीतने वाली कांग्रेस को महज़ चार सीटों से संतोष करना पड़ा। इससे पहले महाराष्ट्र और गुजरात के निकाय चुनावों में भी भाजपा ने बड़ी जीतें हासिल की थी, लेकिन, चंडीगढ़ निकाय चुनावों की ये जीत उन सबसे भी अधिक शानदार रही है। साथ ही, इन सब निकाय चुनावों से पहले मध्य प्रदेश, असम, अरुणाचल प्रदेश आदि राज्यों में खाली हुई लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भी उपचुनाव हुए थे, उनमें भी ज्यादातर सीटों पर भाजपा को जनता ने विजयी बनाया था।

यह दिया जा रहा है कि निकाय चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं होते, इसलिये उनमें नोटबंदी कोई मुद्दा ही नहीं था। ये बात एक हद तक सही है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर आधारित होते हैं, लेकिन नोटबंदी देशव्यापी मुद्दा है और इससे इन चुनावसंपन्न निकायों की जनता भी प्रभावित हुई है। अब अगर उस जनता के मन में नोटबंदी के प्रति जरा-सा भी आक्रोश होता या इस निर्णय को वो गलत मानती तो हाल के सभी निकाय चुनावों में भाजपा को बम्पर रूप से विजयी बनाने का काम क्यों करती ? अगर जनता को लगता कि नोटबंदी पर विपक्ष का विरोध तार्किक और उचित है, तो वो विपक्षी दलों को इन निकायों में तवज्जों क्यों नहीं देती ?  सीधा निष्कर्ष है कि इन चुनावों में नोटबंदी मुद्दा रहा है और कहीं न कहीं भाजपा की बम्पर जीत को सुनिश्चित करने में इसका  महत्वपूर्ण योगदान भी रहा है।

इन सब चुनावों की सबसे विशेष बात ये रही है कि यह सब नोटबंदी के उस निर्णय के बाद हुए है, जिसके विरोध में पूरा का पूरा विपक्षी खेमा एक सुर में लामबंद हुआ पड़ा है और जिसके विरोध के नाम पर विपक्षी खेमे ने संसद के शीतकालीन सत्र को अपने हंगामें की भेंट चढ़ा दिया। अब इन चुनाव परिणामों के बाद विपक्ष के विरोध की कलई भी पूरी तरह से खुल चुकी है कि नोटबंदी के कारण जनता की जिस कथित पीड़ा और आक्रोश का गान करते हुए ये भाजपा सरकार को बिना मतलब ही भरपूर कोस रहे हैं, वो जनता हर स्तर पर चुनाव में इन्हें लगातार खारिज़ और सत्ताधारी दल को स्वीकार रही है। इसका एक अर्थ यह भी है कि जनता नोटबंदी के निर्णय से बिलकुल भी नाराज़ नहीं है, बल्कि इसका बेमतलब विरोध करने वालों से उसे अधिक नाराजगी हो रही है।

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अब तर्क यह दिया जा रहा है कि निकाय चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर नहीं होते, इसलिये उनमें नोटबंदी कोई मुद्दा ही नहीं था। ये बात एक हद तक सही है कि निकाय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर आधारित होते हैं, लेकिन नोटबंदी देशव्यापी मुद्दा है और इससे इन चुनावसंपन्न निकायों की जनता भी प्रभावित हुई है। अब अगर उस जनता के मन में नोटबंदी के प्रति जरा-सा भी आक्रोश होता या इस निर्णय को वो गलत मानती तो हाल के सभी निकाय चुनावों में भाजपा को बम्पर रूप से विजयी बनाने का काम क्यों करती ? अगर जनता को लगता कि नोटबंदी पर विपक्ष का विरोध तार्किक और उचित है, तो वो विपक्षी दलों को इन निकायों में तवज्जों क्यों नहीं देती ?  सीधा निष्कर्ष है कि इन चुनावों में नोटबंदी मुद्दा रहा है और कहीं न कहीं भाजपा की बम्पर जीत को सुनिश्चित करने में इसका  महत्वपूर्ण योगदान भी रहा है। इन सबके बाद, एक बार के लिये अगर मान लें कि इन निकाय चुनावों में नोटबंदी कोई मुद्दा नहीं रहा, तो भी विपक्ष की जो दुर्दशा इनमें हुई है, वो क्या कम हो जाती है। अच्छी बात होगी कि विपक्षी खेमा अब भी वास्तविकता को समझे कि सरकार के प्रति अंधविरोधी रुख और जनता की नब्ज़ को पकड़ पाने में उसकी नाकामयाबी के कारण उसका जनाधार अब धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा है। यह विपक्ष के लिये चेतने का समय है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार।)