यह ‘विकास रथ’ नहीं, अखिलेश सरकार का ‘विदाई रथ’ है!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जैसे–जैसे करीब आ रहा है, सूबे की सियासत भी हर रोज़ नए करवट लेती नजर आ रही है। हर रोज़ ऐसी खबरें सामने आ रहीं हैं, जो प्रदेश की सियासत में बड़ा उलट फेर करने का माद्दा रखतीं हैं। सत्तारूढ़ दल समाजवादी पार्टी की आंतरिक कलह खत्म होने का नाम नहीं ले रही। गत जून माह से ही चाचा शिवपाल और भतीजे अखिलेश के बीच शुरू हुई तल्खी लागतार बढती जा रही है। अगर गौर करें तो चुनाव में अब ज्यादा समय शेष नहीं रह गया है, ऐसे में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी दो खेमे में बंटी हुई नजर आ रही  है, जिसकी बानगी हम कई बार पहले भी देख चुके हैं। एक तरफ  मुख्यमंत्री रथ यात्रा निकाल रहें हैं तो दूसरी तरफ उनके प्रतिद्वंदी चाचा की अगुवाई  में पार्टी रजत जयंती कार्यक्रम की तैयारी कर रही है। अखिलेश और शिवपाल एक दुसरे के राजनीतिक वर्चस्व पर पहले भी प्रहार कर चुके हैं, जिससे सगठन बिखर गया है। दरअसल समाजवादियों को भी चुनाव में अपनी हार का अंदाज़ा अभी से हो गया है।

प्रदेश की जनता  अखिलेश यादव के अबतक के लचर एवं सपा के पुराने ढर्रे पर आधारित शासन को देख और उससे ऊब चुकी है।  अतः अब अखिलेश कितना भी तेवर दिखाएं और कितना भी विकास रथ निकालें, मगर दूबारा उनका सत्ता में आना बेहद कठिन है। हाल ही में आए चुनावी सर्वेक्षण भी इस बात की तस्दीक कर चुकें हैं कि इस विधानसभा चुनाव अखिलेश सरकार जाने वाली है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अखिलेश यादव ने भले ही अपने रथ का नाम ‘विकास रथ’ रखा हो और उसपर चढ़कर अपने हवा-हवाई विकास का ढिंढोरा पीट रहे हों, किन्तु वास्तव में तो यह उनके लिए ‘विदाई रथ’ ही साबित होने वाला है।

चार सालों से सत्ता की कमान संभाल रहे अखिलेश यादव अपनी करोड़ो की रथ यात्रा जैसे ही लेकर लोहिया पथ पर आये उनके समाजवादी रथ ने दम तोड़ दिया। शायद लोहिया भी समाजवाद के इस चकाचौंध स्वरूप को लेकर दुखित हो गये होंगें। खैर, यह यात्रा जनता को लुभाने का एक चुनावी साधन है, यह बात तो ठीक है। लेकिन, चार सालों में प्रदेश की चरमराई कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध, खत्म होते रोज़गार, भ्रष्टाचार और सरकार की कूनीतियों से त्रस्त जनता चीख–चीख कर ये  पूछ रही है कि इस समूचे कुशासन का जिम्मेदार कौन है ? अगर समाजवाद के झंडाबरदार ये समझ रहें हैं कि सपा की इस अंतर्कलह और इसमें अखिलेश द्वारा बगावती तेवर दिखाने के ड्रामे से उनकी सरकार की नाकामियां गौण हो जायेंगी तो वह मुगालते में हैं।

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प्रदेश की जनता एक –एक कदम पर अखिलेश को करारा जवाब देने को तैयार बैठी है। इस यात्रा से पहले भी पोस्टर के जरिये  अंतर्कलह का ड्रामा देखने को मिला। इस बार कड़वाहट पोस्टरों में माध्यम से सामने आई। मुख्यमंत्री अखिलेश की रथ यात्रा “विकास से विजय की ओर” के लिए लगे पोस्टरों में शिवपाल यादव नदारद हैं। जाहिर है कि शिवपाल यादव सपा के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं,  ऐसे में उन्हें मुख्यमंत्री के चुनावी  रथ यात्रा के लिए लगे पोस्टर से गायब कर दिया जाना कोई छोटी घटना नही हैं। दरअसल यह भी उसी समाजवादी ड्रामे की एक कड़ी भर है, जिसके तहत अखिलेश को एक मजबूत, किसीसे न दबने वाले और विकास की ओर उन्मुख नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि ये कोशिश सफल होगी, इसकी संभावना शून्य है। क्योंकि, प्रदेश की जनता  अखिलेश के अबतक के लचर एवं सपा के पुराने ढर्रे पर आधारित शासन को देख और उससे ऊब चुकी है।  अतः अब अखिलेश कितना भी तेवर दिखाएं और कोई विकास रथ निकालें, मगर दूबारा उनका सत्ता में आना बेहद कठिन है। हाल ही में आए चुनावी सर्वेक्षण भी इस बात की तस्दीक कर चुकें हैं कि इस विधानसभा चुनाव अखिलेश सरकार जाने वाली है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि अखिलेश यादव ने भले ही अपने रथ का नाम ‘विजय रथ’ रखा हो और उसपर चढ़कर अपने हवा-हवाई विकास का ढिंढोरा पीट रहे हों, किन्तु वास्तव में तो यह उन्के लिए ‘विदाई रथ’ ही साबित होने वाला है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)