राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख जिन्होंने ग्रामीण विकास व स्वावलंबन का आदर्श मॉडल प्रस्तुत किया

संगठन का कार्य करते हुए नानाजी ने 1969 में राजनीति का त्याग करके सामाजिक जीवन को चुना। राकेश कुमार अपनी पुस्तक ‘भारत रत्न नानाजी देशमुख’ में उल्लेख करते हैं कि नानाजी ने “1978 में गोंडा बलरामपुर के पास जमीन लेकर जयप्रभा नाम से ग्राम विकास, गो-संवर्धन, शिक्षा और कृषि तंत्र सुधार संबंधी काम करना प्रारम्भ किया। उसी समय तुरंत 25 हजार से भी अधिक बांस के नलकूपों का नया प्रयोग कर अलाभकारी जोत को लाभकारी बनाया व कर्ज से लदे भुखमरी का सामने कर रहे किसानों को खुशहाल बनाया”। ऐसे कई किस्से हैं जब नानाजी ने अपने अदम्य साहस, श्रम व संगठन कौशल से कई गांवो की तस्वीर बदली।

राष्ट्र के उत्थान के लिए अपने जीवन को समर्पित करने वालों की चर्चा होते ही एक नाम हमारे सामने सबसे पहले आता है, वह है भारत रत्न राष्ट्र ऋषि, विराट पुरुष नाना जी देखमुख का। नानाजी देशमुख आज भी प्रसांगिक हैं, तो उसका सबसे बड़ा कारण उनका सामाजिक जीवन में नैतिकता और राष्ट्र सेवा के लिए संकल्पबद्ध होकर कठिन परिश्रम करना है।

नानाजी देशमुख के राजनीतिक एवं सामाजिक जीवन की शुरुआत संघ के स्वयं सेवक के रूप में हुई। वह संघ के प्रचारक के साथ–साथ जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और आपातकाल के बाद देश में हुए लोकसभा चुनाव के उपरांत उन्होंने उत्तर प्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा सदस्य चुने जाकर बतौर सांसद भी उल्लेखनीय कार्य किया। नानाजी ने बिना किसी भेदभाव के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी समस्याओं को दूर करने के लिए प्रयास किया।

राष्ट्रऋषि नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख के विचारों की प्रासंगिकता को इस तरह भी समझा जा सकता है कि उन्होंनें जो दर्शन उस समय दिए वह आज भी प्रसांगिक हैं। यह बात सर्वविदित है कि उन्होंने ग्रामीण विकास का एक ऐसा आदर्श मॉडल प्रस्तुत किया, जिसमें ग्रामीण भारत के स्वावलंबन की भावना और योजना दोनों विद्यमान थीं। नानाजी ने गोंडा और चित्रकूट के पास सैकड़ों गावों की तस्वीर को बदल दिया। समुद्री तूफ़ान से उड़ीसा और आंध्र में मची भयंकर तबाही के बीच वहाँ जाकर लोगों की मदद करना हो या गांवों का पुनर्निर्माण करना हो, उन्होंने ऐसे अनेक कठिन कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नानाजी देशमुख के ग्रामीण विकास से प्रेरणा लेते हुए अनेक ऐसे कार्य शुरू किए हैं, जिसमें नानाजी के विचारों की गहरी छाप दिखती है। मोदी सरकार ने देश के सभी गाँवों में बिजली की सुविधा पहुंचाई, खादी की बिक्री आज अप्रत्याशित रूप से बढ़ी है, आयुष्मान के माध्यम से पांच लाख लोगों का ईलाज मुफ्त में हो रहा है। किसानों के लिए किसान सम्मान निधि योजना की बात हो अथवा ई-मंडी माध्यम से किसानों की फसल की ऑनलाइन बिक्री, सरकार ग्रामीणों की हर छोटी से छोटी समस्या का निराकरण करने के किये प्रयासरत है।

अभी हाल ही में दिल्ली में हुनर हाट का आयोजन किया गया था। इस आयोजन ने भारत की कला और प्रतिभाशाली कलाकारों को तो बड़ा मंच दिया ही, साथ ही छोटे-छोटे कारीगरों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी यह सशक्त प्रयास सिद्ध हुआ।

नानाजी स्वदेशी के प्रबल पक्षधर थे। ग्राम विकास के साथ-साथ उनका दर्शन यह भी कहता है कि स्वदेशी को बढ़ाने के लिए सबसे जरूरी है, भारत के पास जो हुनर है उसका सही इस्तेमाल हो, वर्तमान परिपेक्ष्य में नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार भारत के कौशल को निखारने का काम कर रही है।

राजनीतिक शुचिता

वर्तमान समय से जब राजनीति सत्ता और शक्ति अर्जित करने का जरिया बन गई हो, ऐसे में समूचे राजनैतिक दलों को नानाजी देखमुख के जीवन चरित्र के बारे में गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। ऐसा इसलिए भी क्योंकि नानाजी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अंगीकृत करने से राजनीति में फैलती जा रही वैमनस्यता खत्म होगी।

आपातकाल के बाद जब देश में चुनाव हुए और जनता पार्टी की सरकार बनी उस वक्त नानाजी देशमुख को मोरार जी देसाई की सरकार में उद्योग मंत्री बनाया गया, किन्तु उन्होंने मंत्री पद को अस्वीकार कर दिया था। नानाजी ने स्पष्ट कहा था कि साठ साल से अधिक आयु के सांसदों को राजनीति से दूर रहकर संगठनात्मक एवं सामाजिक कार्य करना चाहिए। नानाजी देशमुख ने अपने इस कथन का अपने जीवनकाल के अंतिम समय तक पालन किया।

ग्रामीण विकास की ओर सत्ता का ध्यान आकृष्ट किया

1972 में नानाजी देशमुख ने दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना करके उन्होंने ग्रामीण समस्याओं पर शोध के साथ स्वावलंबन के विभिन्न कार्यों को प्रारम्भ किया। गौरतलब है कि राजनीति छोड़ने के उपरांत उन्होंने एक बार साक्षात्कार में कहा था कि मेरा राजनीति छोड़ने का कारण सरकार द्वारा ग्रामीण विकास से ज्यादा शहरी विकास को तवज्जो देना था।

संगठन का कार्य करते हुए नानाजी ने 1969 में राजनीति का त्याग करके सामाजिक जीवन को चुना। राकेश कुमार अपनी पुस्तक ‘भारत रत्न नानाजी देशमुख’ में उल्लेख करते हैं कि नानाजी ने “1978 में गोंडा बलरामपुर के पास जमीन लेकर जयप्रभा नाम से ग्राम विकास, गो-संवर्धन, शिक्षा और कृषि तंत्र सुधार संबंधी काम करना प्रारम्भ किया। उसी समय तुरंत 25 हजार से भी अधिक बांस के नलकूपों का नया प्रयोग कर अलाभकारी जोत को लाभकारी बनाया व कर्ज से लदे भुखमरी का सामने कर रहे किसानों को खुशहाल बनाया”। ऐसे कई किस्से हैं जब नानाजी ने अपने अदम्य साहस, श्रम व संगठन कौशल से कई गांवो की तस्वीर बदली।

एक घटना मिलती है कि ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया। पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों। इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे। चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता रहा।

नानाजी उनसे कहते थे – “राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम लोग पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकती?” इस तरह के स्फूर्तिदायक वचनों ने वहां की जनता में उत्साह का संचार किया और आज जो चित्रकूट है, वह सबके सामने है।

शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान

भारत की शिक्षा व्यवस्था के हालात को देखकर नानाजी बहुत चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें शिक्षा के साथ संस्कारों की भी बहुलता हो, इसी उद्देश्य से उन्होंने 1950 में गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की उसके पश्चात् नानाजी ने देश में पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय की स्थापना 1991 में की जिसका नाम चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय रखा गया था।

नानाजी ने ग्रामीण भारत की तमाम प्रकार की समस्याओं को देखते हुए कई प्रकार के नए कार्य शुरू किए जिनका उद्देश्य भारत में ग्रामीण आबादी खासकर दलित और वंचित वर्ग का उत्थान करना था। उन्होंने गरीबी दूर करने के लिए कृषि, ग्रामीण स्वास्थ्य, ग्रामीण शिक्षा के साथ-साथ कुटीर उद्योग को भी बढ़ावा देने की दिशा में भगीरथ प्रयास किया। उन्होंने एक योजना की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य था ‘हर हाथ को काम और हर खेत में पानी’। चित्रकूट परियोजना के अंतर्गत नानाजी ने उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के पांच सौ से अधिक गांवों का पुनर्निर्माण करके एक अमिट छाप छोड़ी और इन्हें आत्मनिर्भर बनाया।

ऐसे महान कार्यों को करने वाले इस अद्वितीय व्यक्तित्व, नानाजी देशमुख, का जन्म 11 अक्टूबर 1916 को महाराष्ट्र के एक छोटे से कस्बे कडोली में हुआ था और 27 फरवरी 2010 को परलोकगमन हुआ, इस चौरानवे वर्षीय उम्र में अधिकांश समय नानाजी विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक दायित्वों का निर्वहन करते रहे। आज वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचार, उनके लोककल्याण की दिशा में किये गये कार्य सदैव हमारी स्मृतियों में रहकर हमें प्रेरणा देते और प्रासंगिक रहेंगे।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)