‘प्रणब मुखर्जी और सर संघचालक मोहन भागवत के विचारों का मूल भाव एक जैसा है’

प्रणब मुखर्जी के भाषण को सिलसिलेवार रूप में देखें तो लगेगा कि उन्होंने संघ को बेहतर ढंग से समझा है। यही कारण है कि उनके और सर संघचालक के विचारों का मूल तत्व एक जैसा है। भारत और विश्व की समस्याओं का  समाधान भारतीय चिंतन से हो सकता है। उन्होंने संघ के समारोह में उदारता, राष्ट्रवाद, मानव कल्याण, सहिष्णुता, पंथ निरपेक्षता की जो बात उठाई, वह भारतीय चिंतन के अनुरूप है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नकारात्मक हमलों के बाबजूद इस शाश्वत चिंतन के ध्येय मार्ग पर चल रहा है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नागपुर में  उदार व शाश्वत भारतीय चिंतन से प्रेरित विचार व्यक्त किये। इस चिन्तन के अभाव में उन लक्ष्यों को प्राप्त ही नहीं किया जा सकता, जिसका उल्लेख किया गया। उन्होंने पंथनिरपेक्षता, राष्ट्रवाद, बहुलतावादी समाज, सहिष्णुता जैसे शब्दों की चर्चा की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी ऐसे ही समाज और राष्ट्र की आकांक्षा रखता है। इसी दिशा में उसके प्रयास जारी हैं।

निश्चित ही यह बहुलतावादी देश है। ऐसी विविधता विश्व में कहीं नहीं है। ऐसे में हमारे सामने उदार चिंतन के अलावा सौहार्दपूर्ण ढंग से रहने का दूसरा कोई रास्ता नहीं है। दुनिया में ऐसा उदार चिंतन दुर्लभ है। सभ्यताओं का संघर्ष विश्व इतिहास की सच्चाई है, जो कि अपने  तलवार के बल पर अपने मजहब के प्रचार का परिणाम था। हालांकि ऐसे लोगों के बीच भी भारतीय चिंतन वसुधा को कुटुंब मानने का सन्देश देता रहा, सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करता रहा। ऐसे में जब कोई संगठन हिंदुत्व की बात करता है, तब उसमें किसी अन्य मतावलंबी के प्रति द्वेषभाव नहीं होता वल्कि हिंदुओं के संगठन का विचार  होता है, जिससे मानवता का शाश्वत सन्देश कमजोर न पड़े।

प्रणब मुखर्जी ने जिस पंथनिरपेक्षता की बात कही, वह ऐसे ही उदार चिंतन में संभव है। यह किसी पर थोपा नहीं जाता, तलवार के बल पर किसी को हिन्दू नहीं बनाया जाता, यह मजहबी भेदभाव से ऊपर का चिंतन है। इसमें माना जाता है कि उपासना पद्धति अलग-अलग हो सकती है। यह सबका अधिकार है। हमको सभी का सम्मान करना चाहिए। हमारे त्रिकालदर्शी ऋषियों ने भी यही कहा। उन्होंने अपने विचार दिए , लेकिन साथ में यह भी जोड़ दिया कि ये विचार अंतिम नहीं हैं। जिज्ञाशा अनन्त है। समाधान के प्रयास चलते रहने चाहिए। 

बहुलतावाद, पंथनिरपेक्षता, सहिष्णुता की आज दुनिया में क्या स्थिति है, यह बताने की जरूरत नहीं। सभ्यताओं के संघर्ष का इतिहास भी रक्तरंजित था। आज भी अनेक इलाके हिंसाग्रस्त हैं। इनका सहिष्णुता से कोई लेना देना नहीं होते। ऐसे में मानवता की रक्षा उदार भारतीय विचारों से हो सकती है। मुखर्जी ने राष्ट्रवाद शब्द का उल्लेख किया। भारतीय राष्ट्रवाद भी उसी चिंतन से प्रेरित है। भारत विश्वगुरु था, यह दर्जा उसने तलवार के बल पर प्राप्त नहीं किया था। यह ज्ञान, सद्भाव और विश्वकल्याण की कामना पर आधारित था। संघ आज भी ऐसे ही राष्ट्रवाद का हिमायती है। प्रणब मुखर्जी ने डॉ. हेडगेवार को भारत माता का महान सपूत बताया। निःसन्देह डॉ. हेडगेवार के योगदान से आज भी प्रेरणा लेने की आवश्यकता है।

वस्तुतः संघ के संस्थापक ने किसी नए विचार को चलाने का कभी दावा नहीं किया। वह स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। संघ की स्थापना के बाद भी कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन की व्यवस्था उन्होंने की थी। जाहिर है कि वह देश को स्वतंत्र कराने के प्रयास में लगे थे। यह प्रयास उन्होंने संघ की स्थापना के बाद भी जारी रखा। केवल तरीका बदला था। संघ के स्वयंसेवक स्वतंत्रता संग्राम को संचालित रखने में सहयोगी बनते थे।

लेकिन डॉ हेडगेवार को एक प्रश्न विचलित करता था। वह सोचते थे कि जो देश हजारों वर्षों तक विश्वगुरु रहा, वह गुलामी की जंजीरों में कैसे जकड़ गया। गहन चिंतन, अध्ययन, विचार-विमर्श के बाद वह इस चिंतन पर पहुंचे थे कि आत्मगौरव, आत्मस्वाभिमान को भुलाने और निजी स्वार्थ को राष्ट्र से ऊपर मानने के कारण हमारी यह दुर्गति हुई है।

इसलिए आजादी और आत्मगौरव को हासिल करने की योजना के अंतर्गत उन्होंने संघ की स्थापना की थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की कार्य पद्धति में प्रचार के मोह को स्थान नहीं मिला। इसकी जगह व्यक्तिगत संपर्क और निःस्वार्थ भाव से राष्ट्रसेवा को वरीयता दी गई। लेकिन अक्सर आलोचकों के नकारात्मक कार्य अनेक सकारात्मक तथ्य उजागर करने का अवसर देते है।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नागपुर जाना ऐसा ही प्रकरण बन गया।  कांग्रेस के नेताओ ने संघ के कार्यक्रम में उनके जाने का विरोध किया। उनकी इस हरकत से ही इतिहास के अनेक पृष्ठ नए सिरे से चर्चा में आ गये। जब महात्मा गांधी संघ के शिविर में जा सकते है, वहां स्वयं सेवकों से संवाद कर सकते है, उनके शिविरों में भोजन व्यवस्था, रसोई, भोजन वितरण आदि का अध्ययन कर सकते है, तो प्रणब मुखर्जी का वहाँ जाना गलत कैसे हो सकता है।

महात्मा गांधी यह देखकर चकित थे कि संघ के स्वयंसेवको के बीच कोई जाति भेद की भावना ही नहीं थी। कौन बना रहा है, कौन परोस रहा है, कौन साथ में बैठ कर एक पंगत में भोजन कर रहा है, इसका कोई जातिगत विवरण ही नहीं था। यह वह समय था, जब देश में अश्पृश्यता थी। महात्मा गांधी सहित अनेक महापुरुष इसे समाप्त करने का अभियान चला रहे थे। लेकिन यह कार्य संघ के संस्थापक ने इतनी सहजता से कर लिया था। इसे देख कर महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुए थे। डॉ आम्बेडकर भी इस समरसता के विचार को अच्छा मानते थे।

इस प्रकार इतिहास के अनेक पृष्ठ पलटे गये। आजादी के बाद गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने सरसंघचालक  गुरु गोलवलकर को कश्मीर नरेश से वार्ता हेतु भेजा था। कश्मीर समस्या के समाधान में उन्होंने भी सरदार पटेल के आग्रह पर पूरा सहयोग किया था। कांग्रेस के वर्तमान नेताओं को इतिहास के वह पृष्ठ भी दिखाए गए, जब जवाहर लाल नेहरू और लाल बहादुर शास्त्री ने बतौर प्रधानमंत्री संघ के स्वयंसेवको को गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के लिए राजपथ पर आमंत्रित किया था। नेहरू बाँसठ और शास्त्री पैसठ के युद्ध में संघ के स्वयं सेवकों के आंतरिक व्यवस्था में सहयोग से प्रभावित थे।

यह बताने की जरूरत नहीं कि संघ के  राष्ट्रभाव से प्रभावित होकर ही उसे गणतंत्र दिवस परेड में आमंत्रित किया गया था। यह राष्ट्रभाव की प्रेरणा है जो संघ के स्वयंसेवकों को सेवा कार्यो की ओर ले जाती है। फिर चाहे वह बाहरी आक्रमण हो या प्रकृति की आपदा, स्वयं सेवक निःस्वार्थ भाव से सेवा कार्य में लग जाते है। जाति-मजहब के भेदभाव का कोई विचार नहीं किया जाता है। 

इतिहास का एक अन्य महत्वपूर्ण पृष्ठ जय प्रकाश नारायण आंदोलन से निकले नेताओं के लिए था। इनमें केवल जदयू नेताओं में सच्चाई की स्वीकार करने का साहस है। अन्य लोग प्रणब के वहाँ जाने से नाराज बताए गए। जबकि जिनके आंदोलन से ये नेता बने वह जयप्रकाश नारायण संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे। उन्होंने तो यहां तक कहा था कि यदि संघ साम्प्रदायिक है, तो मैं भी साम्प्रदायिक हूं।

प्रणब मुखर्जी ने भी इन्हीं बातों को आगे बढ़ाया है। उन्होंने ठीक कहा कि हमारा समाज शुरू से ही खुला था और सिल्क रूट से पूरी दुनिया से जुड़ा था। यही नहीं, यूरोप से बहुत पहले ही हम राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुके थे और हमारा राष्ट्रवाद उनकी तरह संकुचित नहीं था।  यूरोपीय राष्ट्रवाद साझा दुश्मन की अवधारणा पर आधारित है, लेकिन वसुधैव कुटुंबकम की विचारधारा वाले भारत ने पूरी दुनिया को अपना परिवार माना। प्राचीन काल में भारत आने वाले सभी यात्रियों ने इसकी प्रशासनिक दक्षता, ढांचागत सुविधा और व्यवस्थित शहरों की तारीफ की है।

राष्ट्रवाद किसी भी देश की पहचान होती है।  भारतीय राष्ट्रवाद में एक वैश्विक भावना रही है। विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। सहिष्णुता हमारी सबसे बड़ी पहचान है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसी ध्येय मार्ग का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि विविधता में एकता ही हमारी संस्कृति है। तत्वज्ञान की यहाँ कभी कमी नहीं थी। व्यवहार में अवश्य लापरवाही हुई। इसका देश को नुकसान उठाना पड़ा। भारत को दुनिया की समस्याओं का जवाब देना है। संगठित समाज ही बदलाव ला सकता है। 

प्रणब मुखर्जी के भाषण को सिलसिलेवार रूप में देखें तो लगेगा कि उन्होंने संघ को बेहतर ढंग से समझा है। यही कारण है कि उनके और सर संघचालक मोहन भागवत के विचारों का मूल भाव एक जैसा है। भारत और विश्व की समस्याओं का  समाधान  भारतीय चिंतन से हो सकता है। उन्होंने संघ के समारोह में उदारता, राष्ट्रवाद, मानव कल्याण, सहिष्णुता, पंथ निरपेक्षता की जो बात उठाई, वह भारतीय चिंतन के अनुरूप है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नकारात्मक हमलों के बावजूद इस शाश्वत चिंतन के ध्येय मार्ग पर चल रहा है।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)