तीन तलाक प्रकरण दिखाता है कि महिलाओं के हितों के प्रति समर्पित है मोदी सरकार !

न्यायालय के इस फैसले का बड़े उल्लास के साथ मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया है। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के लोग ख़फ़ा हैं और इसे मानना नहीं चाहते, पर मन से या क़ानून के भय से उन्हें भी ये निर्णय स्वीकारना ही पड़ेगा। पितृसत्तात्मक समाज से ऊपर उठने में अभी कई सामुदायिक और व्यक्तिगत मतभेद हैं, जिसे ये मज़बूत सरकार और जनता का मज़बूत विश्वास मिलकर जल्द ही नष्ट कर देंगे।

शाह बानो मामले में भी न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था, मगर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने शाहबानों का साथ नहीं दिया बल्कि क़ानून बनाकर न्यायालय के फैसले को पलट डाला था।  लेकिन, इस बार जब न्यायालय ने तीन तलाक के खात्मे का ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए क़ानून बनाने का जिम्मा सरकार पर डाला है, तब  ऐसी सरकार है जो पूरी तरह से मुस्लिम महिलाओं के साथ खड़ी है।  न्याय की देवी ने इस बार मुस्लिम महिलाओं के लिए जिस फ़ैसले पर मुहर लगाई, उसकी ख़ुशी उनके इंटरव्यूज में देखी जा सकती है।

तीन तलाक़ यानि तीन बार तलाक़ कह देने पर तलाक़ मान लेना मुस्लिम समाज की एक कुरीति रही है। अगर शौहर तीन बार तलाक़ कह दे तो तलाक़ हो जाता है, जबकि  बीवी त्तलाक लेने के लिए भी आवाज़ नहीं उठा सकती है। सलमा आघा की 1982 की फिल्म ‘निक़ाह’ में इसे बड़े कारुणिक ढंग से दिखाया गया है। कई संगठन और एक्टिविस्ट्स इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहे हैं, लेकिन मज़हब के नाम पर जो कुरीति थी, उसे बदलने के लिए मज़बूती से फैसला लेने की ज़रूरत थी।  

22 अगस्त 2017 को पांच न्यायाधीशों में से 3 ने तीन तलाक़ को ख़ारिज करते हुए कहा कि मजहबी क़ानून में हस्तक्षेप करने की आज़ादी आर्टिकल 25(2) में मिलती है। चूँकि, मुस्लिमों के निजी कानून के अंतर्गत इस प्रथा को माना जाता था, लेकिन उसमें भी संशोधन के रास्ते संविधान हमें देता है। तीन तलाक़ को जहां असंवैधानिक माना गया, वहीं ये समझना भी जरूरी है कि ये एक कुरीति है। 3:2 के अनुपात से ये फ़ैसला ले लिया गया। 

सांकेतिक चित्र

कई महिला वकीलों का कहना था कि किसी भी प्रगतिशील देश में ऐसी कुरीति के लिए कोई जगह नहीं है। पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश समेत अन्य 18 मुस्लिम देशों ने  इसपे रोक लगा रखी है।  पर, भारत को शायद एक मज़बूत निर्णायक सरकार का इंतज़ार था, क्योंकि इतिहास पलटकर देखें तो शाहबानो मामले में जब मुस्लिम औरतों के साथ खड़े होने का एक अवसर आया था, तब राजीव गाँधी की सरकार ने न्यायालय के फैसले को पलटकर उनसे किनारा कर लिया था। लेकिन, आज मौजूदा सरकार ने उनकी तकलीफों को समझते हुए उनके साथ खड़े होकर अपने संवेदनशील रुख का परिचय दिया है। कह सकते हैं कि एक सरकार ने शाह बानों के साथ अन्याय किया था, आज एक सरकार ने शायरा बानो को न्याय दिलाया है।

समानता की बात भारत ने शुरू से ही की है। रज़िया सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीर महिलाओं के देश में हम एक समुदाय को उसका हक़ नहीं दे पा रहे थे, ये हमारी असफ़लता थी। जहाँ भारत दहेज प्रथा को हटाकर, सख्त क़ानून लाता है, बेटियों को उनके पिता के जायदाद में हिस्से का पात्र बनाता है, वहीं एक समुदाय पूरी तरह से पीछे छूट रहा था।  

मोदी सरकार ने हाल ही में तीन तलाक़ को ख़त्म करने का वादा यूपी चुनाव के दौरान किया था। आलोचकों का कहना था कि ये सिर्फ जुमला है और चुनावी वादा है।  हालाँकि निर्णय का श्रेय तो सर्वोच्च न्यायालय को ही जाता है, मगर इसमें सरकार की भो महत्वपूर्ण भूमिका रही है और आगे भी है। मुख्य न्यायमूर्ति ने सरकार से इस मामले में छः महीने के अंदर क़ानून लाने को कहा है।

अब भी कई कुरीतियां सदियों से ऐसी चली आ रहीं हैं, जैसे हलाला, बहुपत्नी आदि जो कि मुस्लिम महिलाओं के बुनियादी अधिकारों का हनन है। एक से ज़्यादा पत्नियां रखने की भी आज़ादी है, जहाँ कई कमज़ोर महिलाएं कुछ नहीं कह पाती हैं।  हालाँकि समय के साथ ऐसी प्रथाएं कम हुईं हैं। लेकिन तीन तलाक़ से जुडी ऐसी कई ख़बरें सामने आई थीं, जिनमें शौहरों ने फोन पर, मैसेज द्वारा, चिट्ठी द्वारा अपनी बीवियों को तलाक़ दे दिया था।  

2016 में शायरा बानो के मामले ने न्यायालय को झकझोर दिया। उनके पति ने चिट्ठी द्वारा उन्हें तलाक़ दे दिया था। इस मामले ने न्यायालय को गंभीरता से सोचने पर मजबूर कर दिया।  2 महीने बाद आफ्रीन रहमान ने भी अपने तलाक़ को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी और इनके जैसी कई महिलाओं ने न्यायालय में आवाज़ उठाई। मामला खिंचा और कुछ समय बाद पांच न्यायाधीशों को इस पर फैसला लेने का ज़िम्मा सौंपा गया।  एक सिख, एक इसाई, एक हिन्दू, एक पारसी और एक मुस्लिम। आखिरकार आज हम जब इस फैसले को सुनते हैं तो ऐसी महिलाओं पर गर्व होता है जिन्होंने आवाज़ उठाई। 

न्यायालय के इस फैसले का बड़े उल्लास के साथ मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया है। वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के लोग ख़फ़ा हैं और इसे मानना नहीं चाहते, पर मन से या क़ानून के भय से उन्हें ये सच्चाई स्वीकारनी पड़ेगी। पितृसत्तात्मक समाज से ऊपर उठने में अभी कई सामुदायिक और व्यक्तिगत मतभेद हैं, जिसे ये मज़बूत सरकार और जनता का मज़बूत विश्वास मिलकर जल्द ही नष्ट कर देंगे और प्रगतिशील भारत में समानता को सही ढंग से परिभाषित किया जा सकेगा।

(लेखिका डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन में इंटर्न हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)