‘हिन्दू आतंकवाद’ का झूठ फैलाने के लिए देश से कब माफ़ी मांगेगी कांग्रेस !

आतंकवाद पनपने की संभावना वहाँ होती है, जहाँ अन्य मजहबों के प्रति असहिष्णुता का भाव रखा जाता है। आज दुनिया किस प्रकार के आतंकवाद से परेशान है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान से लेकर सीरिया, लेबनान तक आतंकवाद का कहर है। अमेरिका और यूरोप के देश भी आतंकी हमला झेल चुके हैं। आज भी इन्हें अपने को आतंकी हमले से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा प्रयास करने पड़ रहे हैं। विश्व की प्रायः सभी बड़ी आतंकी घटनाओं को उठा कर देखिये, कही भी हिन्दू का हाथ नहीं मिलेगा। और यह भी देख लीजिये कि इन घटनाओं में लिप्त लोग किस मजहब से जुड़े हैं, तो आतंकवाद का उद्गम पता चल जाएगा।

गत ग्यारह वर्षों से हिन्दू आतंकवाद की कांग्रेसी साज़िश का शिकार होकर जेल यंत्रणा झेल रहे असीमानन्द को अंततः न्याय मिला। राष्ट्रीय जांच एजेंसी की विशेष अदालत ने उन्हें रिहा कर दिया। यह मसला पांच लोगों की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से भगवा आतंकवाद शब्द भी निर्मूल साबित हुआ। यह शब्द दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को अपमानित करने वाला था। ऐसा करने वालों के अपराध की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

असीमानंद

न्यायपालिका की प्रक्रिया अपनी जगह है, उसका सम्मान होना चाहिए। लेकिन, इस मसले पर विस्फोट की घटना और उसके लिए  कांग्रेस के  नेताओं द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द, दोनों का अलग-अलग महत्व था। मक्का मस्जिद या समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट करने का अपराध जघन्य था। जिसने भी इसे अंजाम दिया, उसे कानूनी शिकंजे में लाने का पूरा प्रयास तत्कालीन सरकार को करना चाहिए था। लेकिन, इन मसलों पर तत्कालीन कांग्रेसनीत संप्रग सरकार का नजरिया हैरान करने वाला था। यह लग ही नहीं रहा था कि तत्कालीन सरकार की वास्तविक अपराधी को पकड़ने में दिलचस्पी थी। वह तो भगवा या हिन्दू आतंकवाद की धारणा स्थापित करने में लगी थी।

हिन्दू अपराधी हो सकते हैं, लेकिन आतंकवादी नहीं हो सकते। क्योंकि, आतंकवाद एक ख़ास किस्म की मजहबी विचारधारा से पनपता है। सम्पूर्ण हिंदी वांग्मय में ऐसा कोई तथ्य नहीं है, जिससे किसी को आतंकवादी बनने की प्रेरणा मिले। सभ्यताओं के टकराव में भी हिन्दू शामिल नहीं थे। इसमें तो वसुधा को कुटुंब माना गया। कभी तलवार के बल पर अपने मत के प्रचार का प्रयास नहीं किया। ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है। सभी पंथों के सम्मान का विचार केवल हिन्दू संस्कृति में ही है। इसमें परम् सत्ता तक पहुंचने के सभी मार्गो अर्थात उपासना पद्धति को सम्मान दिया गया। यह नहीं कहा गया कि हिन्दू संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ है। या ईश्वर तक पहुंचने का यही एक मार्ग है। सबके कल्याण की कामना की गई। ऐसे चिंतन में कभी आतंकवाद पनप ही नही  सकता।

आतंकवाद पनपने की संभावना वहाँ होती है, जहाँ अन्य मजहबों के प्रति असहिष्णुता का भाव रखा जाता है। आज दुनिया किस प्रकार के आतंकवाद से परेशान है, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है। पाकिस्तान से लेकर सीरिया, लेबनान तक आतंकवाद का कहर है। अमेरिका और यूरोप के देश भी आतंकी हमला झेल चुके हैं। आज भी इन्हें अपने को आतंकी हमले से बचाने के लिए विशेष सुरक्षा प्रयास करने पड़ रहे हैं। विश्व की प्रायः सभी बड़ी आतंकी घटनाओं को उठा कर देखिये, कही भी हिन्दू का हाथ नहीं मिलेगा। और यह भी देख लीजिये कि इन घटनाओं में लिप्त लोग किस मजहब से जुड़े हैं, तो आतंकवाद का उद्गम पता चल जाएगा।  

इस वैश्विक माहौल में कांग्रेस के दिग्गजों ने हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था। यह बात किसी साधारण नेता ने कही होती तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता था। लेकिन, यह बात कांग्रेस सरकार के गृहमंत्री सहित कई मंत्रियों और कांग्रेस संगठन के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तथा महामंत्री जैसे लोगों ने कही थी। लेकिन, इनमें से किसी के पास हिन्दू या भगवा आतंकवाद का कोई प्रमाण नहीं था। यह शब्द गढ़ने वाले वही लोग थे, जो कहते रहे हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। हिन्दू आतंकवाद का झूठा शब्द गढ़ते समय इन्हें एक बार भी अपना कथन ध्यान नहीं आया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन, कांग्रेस के दिग्गज इसे बार बार दोहराते रहे। मुस्लिम तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति के लिए कांग्रेसी हुक्मरानों ने हिन्दू आतंकवाद की भ्रामक अवधारणा का कुप्रचार किया। 

इसके लिए उन्होंने न केवल भारतीय समाज बल्कि भारतीय विदेशनीति का भी नुकसान किया था। हिन्दू आतंकवाद पर फोकस करने से वास्तविक अपराधी की ओर से ध्यान हट गया। सरकार और सत्ता पक्ष के इस नजरिए का सर्वाधिक फायदा इन्हीं तत्वों ने उठाया होगा। विदेश नीति के अंतर्गत उस सरकार ने भारत विरोधी तत्वों को हमले का अवसर दिया। इससे सर्वाधिक खुशी पाकिस्तान को हुई। वह इस्लामी आतंकवाद को संरक्षण देने का आरोप झेल रहा था। प्रत्येक आतंकी घटना के तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जुड़े मिलते थे। वहां आतंकी संगठनों को खुली पनाह मिलती है, ये बात अब दुनिया  भी स्वीकार लिया है। लेकिन, ऐसा पाकिस्तान उस समय कांग्रेसी कुचक्र के कारण उल्टा भारत पर आरोप लगाने लगा।

पाकिस्तान कहने लगा कि भारत हिन्दू आतंकवाद रोके। भारत जब मुंबई बम विस्फोट के आरोपियों को सजा देने की मांग करता था, तब पाकिस्तान जामा मस्जिद, समझौता एक्सप्रेस बम ब्लास्ट के आरोपियों का सजा दिलाने की बात करने लगा। पाकिस्तान जैसे आतंकी मुल्क को यह मौका संप्रग सरकार और कांग्रेस पार्टी ने दिया था। 

कहा जा रहा है कि चौसठ गवाह मुकर गए। सवाल यह है कि हिन्दू आतंकवाद के नाम पर  कुछ लोगों की गिरफ्तारी के बाद लगभग सात वर्षों तक केंद्र में यूपीए की सरकार थी। जांच एजेंसियां उसके  नियंत्रण में थी। अनेक एजेंसियो से जांच कराई गई। अंत में राष्ट्रीय जांच एजेंसी को कार्य सौंपा गया। लेकिन, हिन्दू आतंकवाद कहीं नजर नहीं आया। नज़र आने के लिए होना भी तो चाहिए।  खैर, इन लोगों के बरी साबित होने के साथ-साथ कांग्रेस का असल चेहरा और चरित्र बेनकाब हो रहा है।

वोट बैंक की राजनीति के लिए कांग्रेस किसी भी हद तक जा सकती है। पिछले कुछ महीने के उदाहरण भी सामने हैं। गुजरात कांग्रेस के नेता मंदिर-मंदिर दौड़ते रहे। यह जनेऊधारी रूप था। पूर्वोत्तर राज्यों में चर्च का प्रभाव दिखा। कर्नाटक में वोट के लिए हिन्दू धर्म को ही विभाजित कर दिया। लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दे दिया। हालांकि राज्य सरकार को ऐसा करने का कोई अधिकार ही नहीं है। दूसरी बात कि विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के कुछ दिन पहले इसका वैसे भी कोई महत्व नहीं था। लेकिन, मसला फिर वही है कि कांग्रेस वोट के लिए कुछ भी कर सकती है।

बहरहाल, हिन्दू आतंकवाद शब्द का जवाब मतदाताओं ने बीते लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ठीक ढंग से दिया। कांग्रेस सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई। अब न्यायपालिका के निर्णय से भी स्थिति अपरोक्ष रूप से स्पष्ट हुई है कि भगवा आतंकवाद जैसी कोई चीज नहीं होती। कांग्रेस को अपने इस कुकृत्य के लिए देश से सार्वजनिक माफ़ी मांगनी चाहिए।

(लेखक हिन्दू पीजी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)