संस्कृति

केवल दार्शनिक और सन्यासी ही नहीं, महान समाज सुधारक भी थे शंकराचार्य

शंकराचार्य के कर्तृत्व और जीवन यात्रा को देखने पर हम पाते है कि वैदिक धर्म को उन्होने समय की मांग, व्यक्ति की रूचि एवं जिज्ञासा तथा समाज के कल्याण की सर्वोपरि भावना के रूप में व्याख्यापित किया। आत्म ज्ञान एवं मोक्ष के प्रति उत्कट भावना ने उन्हे मात्र नौ वर्ष की आयु में सन्यास आश्रम में प्रवेश करा दिया। कदाचित् यह आश्रम व्यवस्था का व्यतिक्रम है, यदि ऐसा वे उस समय कर सकते हैं

गंगा-यमुना के बाद अब नर्मदा को भी मिले जीवित मनुष्यों के समान अधिकार

जब उत्तराखंड के नैनीताल उच्च न्यायालय ने मोक्षदायिनी माँ गंगा नदी को मनुष्य के समान अधिकार देने का ऐतिहासिक निर्णय सुनाया था और गंगा नदी को भारत की पहली जीवित इकाई के रूप में मान्यता दी थी, तब ही शिवराज सिंह चौहान के मन में यह विचार जन्म ले चुका था। वह भी सेवा यात्रा के दौरान नर्मदा नदी को मनुष्य के समान दर्जा देने के लिए उचित अवसर की प्रतीक्षा कर

प्रकृति, श्रद्धा और संगीत का पर्व है वसंत पंचमी

कालजयी रचनाकार रवींद्रनाथ टैगोर की उक्त पंक्तियां वसंत ऋतु के महत्व को दर्शाती हैं। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में ऋतुओं का विशेष महत्व रहा है। इन ऋतुओं ने विभिन्न प्रकार से हमारे जीवन को प्रभावित किया है। ये हमारे जन-जीवन से गहरे से जुड़ी हुई हैं। इनका अपना धार्मिक और पौराणिक महत्व है। वसंत ऋतु का भी अपना ही महत्व है। भारत की संस्कृति प्रेममय रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण

भारतीय अस्मिता और विकास को समर्पित थे दत्तोपंत ठेंगड़ी

भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने अपने पूरे जीवन को राष्ट्र पुनर्निमार्ण के लिए समर्पित कर दिया। उनका हर प्रयास भारतीय अस्मिता और विकास के लिए प्रेरित था। वो भारत के सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति भी सजग रहते थे। अपने लेखन और उद्बोधनों में वह अक्सर कहा करते थे कि हमारी संस्कृति का उद्देश्य संपूर्ण विश्व को मानवता की पथ पर अग्रसर करना है, जहां से हमारी राष्ट्र पुननिर्माण की

लोक मंथन : औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का सार्थक प्रयास

लोकहित में चिंतन और मंथन भारत की परंपरा में है। भारत के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं, जिनमें यह परंपरा दिखाई देती है। महाभारत के कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद से लेकर नैमिषारण्य में ज्ञान सत्र के लिए 88 हजार ऋषि-विद्वानों का एकत्र आना, लोक कल्याण के लिए ही था। भारत में चार स्थानों पर आयोजित होने वाले महाकुम्भ भी देश-काल-स्थिति के अनुरूप पुरानी रीति-नीति छोड़ने और

भारत की प्राचीन ज्ञान परम्परा को धूमिल करने वालों की साज़िश को समझने की जरूरत

इस संसार में सबसे अधिक शक्ति यदि किसी में है तो वह है मनुष्य के विश्वास में क्योंकि यदि विश्वास सकारात्मक है तो आप मृत्यु के मुख से भी वापस आ सकते हैं जैसे उदाहरण के लिए परम वीर चक्र विजेता योगेन्द्र सिंह यादव को ही लें जिनका उनके ईश्वर की सत्ता और देश प्रेम में अटूट विश्वास था जिसके कारण वह टाइगर हिल्स की पहाड़ियों पर हुए विद्ध्वन्स्कारी कारगिल युद्ध से जीवित आ गये। यदि विश्वास किसी पर

अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक-पर्व है दीपावली

इस प्रार्थना में अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की कामना की गई है। दीपों का पावन पर्व दीपावली भी यही संदेश देता है। यह अंधकार पर प्रकाश की जीत का पर्व है। दीपावली का अर्थ है दीपों की श्रृंखला। दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘दीप’ एवं ‘आवली’ अर्थात ‘श्रृंखला’ के मिश्रण से हुई है। दीपावली का पर्व कार्तिक अमावस्या को मनाया जाता है। वास्तव में दीपावली एक दिवसीय पर्व नहीं है, अपितु यह

लोक-साहित्य : भारतीय परम्पराओं का जीवंत प्रमाण

देवेंद्र सत्यार्थी के शब्दों में, लोक साहित्य की छाप जिसके मन पर एक बार लग गई फिर कभी मिटाए नहीं मिटती। सच तो यह है कि लोक-मानस की सौंदयप्रियता कहीं स्मृति की करूणा बन गई है, तो कहीं आशा की उमंग या फिर कहीं स्नेह की पवित्र ज्वाला। भाषा कितनी भी अलग हो मानव की आवाज तो वही है।

भारतीय राजनीति में संस्कृति के अग्रदूत थे पंडित दीनदयाल उपाध्याय

एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 100वीं जयंती 25 सितंबर को है। चूँकि दीनदयाल उपाध्याय भाजपा के राजनीतिक-वैचारिक अधिष्ठाता हैं। इसलिए भाजपा के लिए यह तारीख बहुत महत्त्वपूर्ण है। उनके विचारों और उनके दर्शन को जन सामान्य तक पहुँचाने के लिए भाजपा ने इस बार खास तैयारी की है। दीनदयाल उपाध्याय लगभग 15 वर्ष जनसंघ के महासचिव रहे। वर्ष 1967 में उन्हें

‘संघ मुक्त भारत’ पर नहीं, अपराध मुक्त बिहार पर सोचिये नीतीश जी!

जब कोई शासक अंधी महत्त्वाकांक्षा और सस्ती लोकप्रियता का शिकार हो जाए तो जनता के हित साधने और विधायी ज़िम्मेदारी निभाने की बजाय ‘जुमले’ गढ़ने लगता है। संघ एक विचार है और विचार कभी मरता नहीं। संघ भी एक विचार है, एक सांस्कृतिक आंदोलन है, समाज के भीतर कोई संगठन नहीं, बल्कि समाज का संगठन है