कुर्सी से चिपकने की राजनीति में पीएचडी है केजरीवाल की पार्टी: अन्ना हजारे

भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में अपने अनशन से देश को जगाकर और सरकारों को हिलाकर रख देने वाले अन्ना हजारे से मिलना जैसे सादगी के प्रतीक से मिलना है। महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के रालेगण सिद्धि गांव स्थित यादव बाबा के मंदिर में जुलाई के पहले हफ्ते में वैसी ही चहल-पहल थी,जैसा किसी गांव के मंदिर में होती है। हथियारबंद सिपाहियों और सफारी सूट पहले विशेष सुरक्षा अधिकारियों की तैनाती से ही जाहिर होता है कि इस मंदिर में कोई हस्ती रहती है। रालेगण में उस वक्त हल्की फुहारें पड़ रही थीं। मंदिर में आसपास के गांवों के सरपंचों की बैठक चल रही थी..बैठक के बाद भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के प्रतीक बन चुके अन्ना हजारे से नेशनलिस्ट ऑनलाइन के सम्पादकीय बोर्ड सदस्य उमेश चतुर्वेदी की हुई बात-चीत पर आधारित प्रस्तुत है यह रिपोर्ट:

भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में अन्ना हजारे के सहयोगी रहे अरविन्द केजरीवाल के संबध में सवाल पूछने पर अन्ना कहते हैं कि केजरीवाल ने राजनीति में जाकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया। मैंने पहले ही कहा था कि यह आंदोलन भ्रष्टाचार के खात्मे के लिए होगा, राजनीति के लिए नहीं। मैंने राजनीतिक दल बनाने के लिए अरविंद को रोका था। आज क्या हुआ, जनलोकपाल कानून बन गया, लोकायुक्त कानून बन गया, लेकिन उसे लागू नहीं किया जा सका। भ्रष्टाचार वैसे ही जारी है। मैं पूरे भरोसे से कह सकता हूं कि अगर अरविंद राजनीति में नहीं गया होता, इंडिया अगेंस्ट करप्शन का आंदोलन जारी रहता तो चाहे किसी की भी सरकार होती, उसे नाक रगड़कर भ्रष्टाचार रोकने के लिए जन लोकपाल कानून पूरी तरह से लागू करना पड़ता।

बाकियों से अलग नहीं बल्कि बढ़कर है केजरीवाल की पार्टी
केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विधायकों पर चल रहे भ्रष्टाचार आदि से जुड़े मामलों से जुड़ा सवाल पूछा गया तो अन्ना ने दो टूक कहा कि हमारे यहां हिंदू भाई मरने के बाद अर्थी पर श्मशान ले जाए जाते हैं, मुस्लिम और ईसाई भाई ताबूत में ले जाए जाते हैं। लेकिन ये नेता नाम की कौम है, वे चेयर पर चिपककर श्मशान भी जाना चाहते हैं। अरविंद की पार्टी भी दूसरे नेताओं से अलग नहीं है। कुर्सी से चिपकने और राजनीतिक संस्कृति के मामले में दूसरी पार्टियां अगर ग्रेजुएट हैं तो ये (अरविंद की पार्टी) डॉक्टरेट हैं। इसलिए ही दिल्ली में भी ऐसा ही हो रहा है। अरविंद भी चेयर से चिपक गया है। इसलिए बदलाव की गुंजाइश खास नहीं दिखती। मेरे हिसाब से आम आदमी पार्टी भी दूसरी पार्टियों से अलग नहीं है।

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राजनीति की राह बनी आन्दोलन में रोड़ा
एक सवाल के जवाब में अन्ना कहते हैं कि रामलीला मैदान में हुए अनशन ने देश में भ्रष्टाचार विरोध को लेकर जागृति आई। पूरा देश उठ खड़ा हुआ। लोग भ्रष्टाचार के विरोध में जगह-जगह खड़े हो गए। लगा कि अब देश से भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। देश की असल समस्या भ्रष्टाचार ही है। पूरे देश को दीमक की तरह खा रही है। अगर अफसर जेल जा रहे हैं तो इसकी बड़ी वजह भ्रष्टाचार विरोध को लेकर आई जागृति ही है। लेकिन उसका पूरा फायदा नहीं मिला…इसलिए कि भ्रष्टाचार विरोधी मंच के लोग राजनीति में चले गए। राजनीति में जाकर पक्ष या विपक्ष की राजनीति करने लगे। भ्रष्टाचार खत्म करने का मकसद पीछे छूट गया। अगर अरविंद से मैंने एफिडेविट लिया होता कि वह राजनीति में नहीं जाएगा..भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारियों से एफिडेविट लिया होता तो भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने अंजाम तक पहुंच गया होता। सरकारें नाक रगड़कर जनलोकपाल कानून को पूरी तरह से लागू करने के लिए मजबूर होतीं।

केजरीवाल ने हलफनामा दिया होता तो चुनाव नहीं लड़ पाते  
पुन: आन्दोलन को जागृत करने से जुड़े सवाल पर अन्ना ने कहा कि हमारे संविधान में दल की राजनीति का कहीं जिक्र नहीं है। आजाद होते ही हमने चुनाव दलगत आधार पर कराने शुरू कर दिए। संविधान में पक्ष या विपक्ष की राजनीति का जिक्र नहीं है। व्यक्तिगत राजनीति का जिक्र है। यह जो समूह की राजनीति है, उसी से भ्रष्टाचार बढ़ा, गुंडागर्दी बढ़ी, लूट बढ़ी, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला हुआ, हेलिकॉप्टर घोटाला हुआ, कोयला घोटाला, व्यापम घोटाला हुआ। जाति-पांति की राजनीति की जड़ भी यह समूह की राजनीति(दलगत राजनीति) ही है। मेरा मानना है कि मतदाता को यह बताना होगा। मतदाता चाबी लगाना भूल गया है। मुझे लगता है कि मतदाता को जगाने के लिए 12 साल का तप करना पड़ेगा। मतदाता जब जागरूक होगा, उसे पता चलेगा कि हमारा संविधान सारे भ्रष्टाचारों की जड़ दलगत राजनीति की बात नहीं करता तो समूह की राजनीति के खिलाफ भी जागृति आएगी। जब मतदाता यह सोच लेगा कि मैं पक्ष-पार्टी की बजाय व्यक्ति को उसके गुण-दोष और ईमानदारी पर वोट दूंगा, उसी दिन समूह की राजनीति खत्म हो जाएगी। इसके लिए इन दिनों मैं काम कर रहा हूं। इसके लिए मैंने एक एफिडेविट बनाया है। इस आंदोलन में शामिल होने वाले लोगों के लिए शर्तें हैं। इसके मुताबिक हर आंदोलनकारी को भारत मां की शपथ लेकर किसी भी पार्टी-पक्ष को वोट ना देने की बात स्वीकार करनी होगी। इसके साथ ही आचार-विचार शुद्ध रखने, अपमान सहने, चुनाव न लड़ने, निंदा करने वाले का जवाब ना देने जैसी बातों की शपथ लेनी होगी। अब तक ऐसे ढाई हजार लोग शपथ ले चुके हैं। जिस दिन शपथ लेने वालों की संख्या एक लाख हो जाएगी, मैं रामलीला मैदान पर पक्ष-विपक्ष की राजनीति के खिलाफ बैठ जाऊंगा। अगर ऐसा एफिडेविट होता तो अरविंद भी चुनाव नहीं लड़ पाता।