कोरोना संकट में श्रमिकों पर राजनीति कर विपक्षी दलों ने अपना असल चरित्र दिखा दिया

1 मई से 9 जुलाई के बीच रेल मंत्रालय ने 4165 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाईं, जिसमें 63 लाख लोगों को अपने गृह राज्यों में भेजने का काम किया। श्रमिकों के लिए इस योजना में रेल मंत्रालय ने कहा कि टिकट का 85 फीसदी खर्च केंद्र स्वयं वहन करेगा और अन्य 15 फीसदी सम्बंधित राज्य सरकारें वहन करेंगी, लेकिन देश के बड़े मीडिया संस्थानों ने इसको बिलकुल अलग तरह से रिपोर्ट किया, जिससे बाद में उनकी किरकिरी भी हुई।

एक उक्ति हम हमेशा ही सुनते रहे हैं कि कठिन समय में ही व्यक्ति की विश्वसनीयता की पहचान होती है। कोविड संकट के दौर में भी कुछ ऐसा ही हुआ। इस संकट ने भारतीय राजनीति में अनेक राजनीतिक दलों के असल चरित्र को बेपर्दा कर दिया। एक तरफ जहाँ पूरी मानव सभ्यता के ऊपर इस संकट में सामान्य नागरिक से उत्तरदायित्वबोध की अपेक्षा की जा रही है, वहीं कुछ राजनीतिक दलों ने आपदा के इस इस दौर में भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का ही काम किया है।

इसका ज्वलंत उदाहरण हम लॉकडाउन के आरंभिक समय में एक प्रमुख विपक्षी दल के मुखिया के गैर जिम्मेदाराना बयान के बाद मुंबई में एक रेलवे स्टेशन पर श्रमिकों के हजारों की संख्या में इकठ्ठा होने के रूप में देखते हैं। दिल्ली में भी केजरीवाल सरकार के कुप्रबंधन व अफवाह तन्त्र के कारण आनंद विहार बस अड्डे पर भारी भीड़ इकट्ठी हो गयी थी। कांग्रेस और इसके शीर्ष नेताओं की नकारात्मक राजनीति तो हम देख ही शुरू से ही देख रहे हैं।

ऐसे में सवाल है कि आपदा के इस दौर में क्या देश के विपक्षी दलों को अपनी जिम्मेदारी नहीं समझनी चाहिए? क्या सारी जिम्मेदारी सरकार की ही है?

अंतरराष्ट्रीय जनसंख्या विज्ञान संस्थान, मुंबई के एक शोध पत्र के अनुसार भारत में अनेक लोक कल्याणकारी योजनाएं जरूरतमंदों तक सिर्फ इसलिए नहीं पहुँच पाती हैं, क्योंकि अपनी राजनीतिक पहचान (पहचान पत्र या निवास का पता) के अभाव में वे सरकार की नीतियों का हिस्सा नहीं बन पाते हैं।

मोदी सरकार अपने पहले कार्यकाल से ही ऐसी अनेक लोक कल्याणकारी योजनाओं को जमीन पर लेकर आई, जो इन जरुरतमंद लोगों को मुख्यधारा में ला सकें और उनको भी सरकारी नीतियों का हिस्सा बना सकें। चाहें वह जन-धन योजना हो, डिजिटल इंडिया हो या अनेक ऐसी अन्य योजनाएं हों।

साभार : The Financial Express

कोरोना संक्रमण के इस दौर में जब स्वाभाविक तौर पर सरकार की जिम्मेदारी बढ़ गयी है, ऐसे में सरकार ने अनेक क्षेत्रों में, अनेक राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम किया। लेकिन कुछ राज्य सरकारें राजनीति से बाज नहीं आईं।

फिर भी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की बात हो, जरुरतमंदों के खातों में सीधे तौर पर आर्थिक मदद की बात हो या अनेक राज्यों में फंसे विद्यार्थियों को उनके गृह राज्यों में पहुँचाने की बात हो एवं इसके साथ ही एक राशन कार्ड से पूरे देश में राशन प्रदान करने की योजना हो; प्रत्येक योजना के द्वारा सरकार ने गरीब श्रमिकों तक पहुँचने का प्रयास किया और उनकी समस्याओं को कम करने का काम किया है।

1 मई से 9 जुलाई के बीच रेल मंत्रालय ने 4165 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलवाईं, जिसमें 63 लाख लोगों को अपने गृह राज्यों में भेजने का काम किया। श्रमिकों के लिए इस योजना में रेल मंत्रालय ने कहा कि टिकट का 85 फीसदी खर्च केंद्र स्वयं वहन करेगा और अन्य 15 फीसदी सम्बंधित राज्य सरकारें वहन करेंगी, लेकिन देश के बड़े मीडिया संस्थानों ने इसको बिलकुल अलग तरह से रिपोर्ट किया, जिससे बाद में उनकी किरकिरी भी हुई। अनेक कथित पत्रकारों ने तो अपने-अपने सोशल प्लेटफॉर्म्स पर अफवाह फ़ैलाने तक का काम किया।

इन सब के बावजूद आज अनेक ऐसे अनुभव हम अपने आसपास देख सुन सकते हैं, जो इन सभी नकारात्मकताओं के बीच एक सकारात्मक भाव पैदा करते हैं और सरकार की नीतियों से सामान्य जन को मिले लाभ को दर्शाते हैं। इसकी एक बानगी हम इस विडियो में भी देख सकते हैं-

http://https://youtu.be/J-WOXKZ_67s

अहमदाबाद, गुजरात से फिरोजाबाद, उत्तर प्रदेश को जा रही रीना बताती हैं कि वे 20 वर्षों से अहमदाबाद में रह रहीं है। वे बताती हैं कि उन्होंने फॉर्म भरा था तो उनका घर जाने का नंबर आया है और उनका मेडिकल चेक-अप भी किया गया था। विद्यानगर से स्टेशन तक उनको बस से लाया गया और अब वे अपने घर जा रही हैं।

अहमदाबाद में फिरोजाबाद के एक अन्य मजदूर जो लॉक डाउन के कारण फंसे हुए थे, वे विगत 15 वर्षों से अहमदाबाद में रह रहे हैं। उन्होंने बताया कि खाने पीने की अच्छी व्यवस्था की गई है और लॉक डाउन में फंसे मजदूरों को घर पंहुचाया जा रहा है। आगे बताते हैं कि उनको ट्रेन के समय से पहले बुलाकर उनका मेडिकल चेकअप किया गया। ट्रेन के समय के अनुसार बसों से हमें स्टेशन पहुँचाया गया। अब हम लोग ट्रेन के अन्दर बैठे हैं और अब कोई समस्या नहीं हैं।

विद्यानगर, अहमदाबाद में काम करने वाले दिनेश कुमार यादव बताते हैं कि उनका पहले ऑनलाइन पंजीयन हुआ था फिर उनका मेडिकल चेकअप भी हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि पहले बहुत चिंता हो रही थी लेकिन सरकार ने बहुत सहूलियत के साथ उनको बसों से स्टेशन छोड़ा और अब वे अपने गृह प्रदेश जा रहे हैं।

श्रमिकों से हुई इस बातचीत से स्पष्ट है कि रेलवे ने स्टेशन तक पंहुचाने से लेकर मेडिकल चेकअप तथा खाने पीने तक का प्रबंध किया था। ट्रेनों में बैठने से पूर्व वे श्रमिक परेशान अवश्य थे, लेकिन ट्रेनों में बैठने के बाद उन्होंने राहत की साँस ली। यह चीजें इस आपदाकाल में भी केंद्र सरकार के सुप्रबंधन की ही कहानी कह रही हैं, लेकिन अंध-विरोध को ही अपनी राजनीति का मूल बना चुके विपक्षी दलों का रुख इस दौर में उत्तरदायित्वशून्य और निराशाजनक रहा है।

वस्तुतः इस संकट के दौर में सभी को व्यक्तिगत तौर से अपनी जिम्मेदारी समझने के साथ-साथ विपक्षी दलों को भी सरकार के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है। राज्य सरकारों को केंद्र सरकारों के साथ समन्वय स्थापित करके उनका सहयोग करने की जरुरत है। सरकारों के आपसी समन्वय से ही इस आपदा से बेहतर ढंग से लड़ा जा सकता है।

केंद्र सरकार और यूपी सरकार का तालमेल इस विषय में आदर्श कहा जा सकता है और यह बड़ा कारण है कि यूपी में कोरोना संक्रमण की स्थिति अब भी नियंत्रण में है। महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि राज्यों को भी इससे प्रेरणा लेते हुए, अपनी दलीय राजनीति को विराम देकर, केंद्र के साथ मिलकर काम करना चाहिए। समय की यही मांग है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। प्रस्तुत विचार उनके निजी हैं।)