संसार भर में झंडा गाड़ रहे भारतीय मूल के सिख सांसद !

एक दौर में खुशवंत सिंह सिखों के विपरीत हालातों में भी एडजेस्ट होने के जज्बे को समझाने के लिए एक किस्सा सुनाते थे। किस्सा कुछ यूं था कि चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले शख्स नील आर्मस्टांग ने उस संसार में पहुंचने के बाद  सोचा कि चलो थोड़ा घूमा जाए। वे थोड़ी दूर ही पहुंचे थे कि उधर उनको एक सिख सज्जन मिले। वे कारपेंटर का काम कर रहे थे। हैरान आर्मस्टांग ने पूछा, ‘सरदार जी,आप यहां पर कैसे ?’  उनका जवाब था, ‘सरजी, मुल्क के बंटवारे के बाद हम इधर ही आ गए थे।‘ जाहिर है, ये किस्सा काल्पनिक है। पर यह सच है कि सिखों का दुनिया के कोने-कोने में जाकर बसने और फिर वहां पर अपने लिए नई जमीन तैयार करने में कोई सानी नहीं है।

सिख समाज के लिए माना जाता है कि ये मूल रूप से कारोबार में अपने हाथ दिखाना चाहते हैं। उसमें ये सफल भी होते हैं। लेकिन, ये अब अनेक देशों की संसदों में भी पहुंचने लगे हैं। भारत के बाद सर्वाधिक सिख सांसद कनाडा में हैं। कनाडा के पिछले साल हुए आम चुनाव में पांच सिख सांसद चुनकर संसद में पहुंचे और अब वहां पर दो सिख मंत्री हैं।

भारतीय मूल के कनाडाई सिख हरजीत सज्जन को कनाडा का नया रक्षा मंत्री बनाया गया है। हरजीत सज्जन को कनाडाई सशस्त्र बलों के लेफ्टिनेंट कर्नल का मानद पद दिया गया है। वह वैंकूवर साऊथ  के निर्वाचित सांसद हैं। वह भूतपूर्व सैनिक भी हैं, जिन्होंने बोस्निया में अपनी सेवा दी है। इसके साथ ही उनकी अफगानिस्तान के कंधार में तीन बार तैनाती हो चुकी है। सज्जन का जन्म भारत मे हुआ था और जब वह पांच साल के थे, तो उनका परिवार कनाडा चला गया था।

हरजीत सिंह सज्जन

कनाडा में सिख समुदाय के लोग खेती करने आए थे, लेकिन आज कनाडा की पहचान में सिख समुदाय के लोगों का अहम योगदान है। टिम उप्पल भी कनाडा में सिक्खी और भारत के झंडे गाड़ रहे हैं। वे कनाडा की निवर्तमान सरकार में मंत्री थे। उप्पल का संबंध भी कंजरवेटिव पार्टी से है। वे एडमेंटन से सांसद हैं। उनका जन्म भी कनाडा में ही हुआ।

मलेशिया में

अगर बात मलेशिया की करें तो वहां की संसद में वर्तमान में दो सिख हैं। हालांकि भारतीय मूल के तो कई हैं। वहां के चोटी के भारतीय मूल के नेता कृपाल सिंह का कुछ समय पहले निधन हुआ। वे सांसद होने के साथ-साथ देश के चोटी के वकील भी थे। वे डेथ पेनल्टी की हमेशा तगड़ी मुखालफत करते रहे।

गोविंद सिंह देव भी मलेशिया में सांसद हैं। वे पहली बार मार्च, 2008 में सांसद बने सेलगॉर सीट से। वे भी पेशे से वकील हैं। राजनीति की दुनिया में उनके गुरु कृपाल सिंह ही रहे। उऩके भाई जगदीप सिंह पेनांग एसेंबली के सदस्य हैं। दरअसल मलेशिया में भारत वंशियों में सर्वाधिक तमिल हैं। हां, सिखों की भी आबादी खासी है।

अफ्रीका में ‘जो बोले सो निहाल’

परमिंदर सिंह मारवाह  अफ्रीका के किसी भी देश की संसद में पहुंचने वाले पहले सिख सांसद हैं। वे युगांडा की पार्लियामेंट में थे। वे इस साल के शुरू में हुए संसद के चुनाव में हार गए थे। वे बीते साल भारत आए थे। वे चाहते हैं कि भारत के निवेशक युगांडा के कृषि क्षेत्र में आएं। उनके परिवार ने 70 के दशक में भी युगांडा को नहीं छोड़ा था, जब ईदी अमीन भारतीयों पर जुल्म ढा रहे थे। उनके दादा युगांडा में जाकर बसे थे। उनके दादा रेलवे में थे। उन्होंने 30 और 40 के दशक में ईस्ट अफ्रीकी देशों में रेल लाइनें बिछाईं थीं। अंग्रेज भारत से बहुत से मजदूरों को अफ्रीकी देशों में रेल पटरियों को बिछाने के लिए लेकर गए थे। और फिर वे वहां के ही हो गए।

मारवाह अपने भारत भ्रमण के दौरान खासतौर पर स्वर्ण मंदिर गए थे मत्था टेकने के लिए। उन्हें गुरुदास मान की गायकी पसंद है। उनके पुऱखे जालंधर से हैं। वे रामगढ़िया बिरादरी से आते हैं। उन्होंने एक रोचक जानकारी दी। उन्होंने बताया कि युगांडा में भी बहुत से लोग मानते हैं कि गुरु नानक देव जी बेंब ननिका में आए थे। ये जगह युगांडा की राजधानी कम्पाला के निकट है।

सोनिया बिरदी

और अफ्रीका से बाहर निकलने से पहले केन्या भी हो आते हैं। इधर एक सरदारनी सांसद है। नाम है सोनिया विरदी। सोनिया केन्या में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली बड़ी एक्टिविस्ट मानी जाती हैं। दरअसल वे पहली एशियाई मूल की महिला सांसद हैं केन्या में। वे मकरादा नाम की जगह की नुमाइंदगी करती हैं। मकरादा केन्या का अहम शहर इस लिहाज से है, क्योंकि इधर काफी इंडस्ट्रीज हैं। वहां की अर्थव्यवस्था की इसे जान माना जा सकता है। उन्हें पिछले साल सत्तासीन यूनाइटेड रिपब्लिक पार्टी ने संसद के लिए नामित किया था।

सोनिया अपने क्षेत्र में इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थिति को सुधारने के लिए सघन अभियान चला रही हैं। सोनिया अपने क्षेत्र में बिजली सप्लाई की नियमित आपूर्ति के लिए लगातार संघर्षरत हैं। सोनिया को देशभर में वाह-वाही मिली है। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया कि उनकी जीत से केन्या की भारतीय मूल की आबादी बहुत गर्व महसूस कर रही है। सिख समाज तो खुश है ही। उऩके सांसद बनते ही उनके सम्मान में केन्या की राजधानी नेरौबी में श्रीगुरुसिंह सभा ने बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया।

न्यूजीलैंड में चक दे फट्टे

कंवल सिंह बख्शी न्यूजीलैंड की संसद के सिख सांसद हैं। उनका संबंध नेशनल पार्टी से है। उऩका परिवार 2001 में न्यूजीलैंड में जाकर बसा था। वे वहां पर बेहतर नौकरी की संभावनाएं तलाशने के इरादे से आए थे। वे न केवल पहले सिख बल्कि पहले भारतीय हैं, जिन्हें न्यूजीलैंड की संसद में पहुंचने का अवसर मिला। वे दिल्ली से हैं। हालांकि उनके ऊपर आरोप भी लगते रहे हैं। एक बार उनपर आरोप लगा था कि उन्होंने कुछ लोगों को न्यूजीलैंड में नौकरी दिलाने का झांसा देकर मोटा माल बनाया था। पर, पुलिस जांच में उनके खिलाफ आरोप साबित नहीं हुए।

कँवल सिंह बख्शी

उधर, इंदरजीत सिंह भी दिल्ली से हैं। वे सिंगापुर की पार्लियामेंट में हैं। उनकी स्कूली और कालेज की पढ़ाई सिंगापुर में ही हुई। वे पेशे से इंजीनियर हैं। उन्होंने कई कंपनियों में काम किया। बड़े पदों को सँभाला। करीब तेरह सालों के कॉरपोरेट दुनिया के सफर के बाद वे सियासत भी करने लगे। अब वे सियासत को लेकर बेहद संजीदा हैं। उन्होंने एक बार बड़े ही फख्र के साथ कहा था कि सिंगापुर में कई देशों से संबंध रखने वाले सांसद हैं। इससे साफ है कि सिंगापुर हर इंसान को बराबरी का हक देता है। और प्रीतम सिंह भी सिंगापुर की संसद में हैं। वे पेशे से वकील हैं। उनका संबंध वर्कर्स पार्टी से है। उन्होंने इस्लामिक कानून की भी डिग्री ली है।

और चलते-चलते बात पाकिस्तान की हो जाए तो क्या बुराई है। पाकिस्तान में सिखों की आबादी बहुत ही कम है, पर रमेश सिंह अऱोड़ा को वहां की संसद में तो नहीं है, पर पंजाब असेंबली के लिए नामित किया गया। वे सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) की नुमाइंदगी करते हैं। चूंकि उम्मीद पर दुनिया कायम है, तो इसलिए आशा कर सकते हैं कि पड़ोसी मुल्क की संसद में भी कभी कोई सिख पहुंचेगा।

एक दौर में खुशवंत सिंह सिखों के विपरीत हालातों में भी एडजेस्ट होने के जज्बे को समझाने के लिए एक किस्सा सुनाते थे। किस्सा कुछ यूं था कि चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले शख्स नील आर्मस्टांग ने उस संसार में पहुंचने के बाद  सोचा कि चलो थोड़ा घूमा जाए। वे थोड़ी दूर ही पहुंचे थे कि उधर उनको एक सिख सज्जन मिले। वे कारपेंटर का काम कर रहे थे। हैरान आर्मस्टांग ने पूछा, ‘सरदार जी,आप यहां पर कैसे ?  उनका जवाब था, ‘ सरजी, मुल्क के बंटवारे के बाद हम इधर ही आ गए थे।‘ जाहिर है, ये किस्सा काल्पनिक है। पर यह सच है कि सिखों का दुनिया के कोने-कोने में जाकर बसने और फिर वहां पर अपने लिए नई जमीन तैयार करने में कोई सानी नहीं है।

(लेखक यूएई दूतावास में सूचनाधिकारी रहे हैं। वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)