कांग्रेस

संसद सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ाने वाले विपक्षी दलों का जनता करेगी हिसाब

लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद का का काम जनता की भलाई करना होता है, लेकिन शीतकालीन सत्र में जो स्थिति नजर आई, उसे देखकर इस सम्बन्ध में निराशा ही होती है। जिस नोटबंदी पर विपक्ष ने इस पूरे संसद सत्र को हंगामे की भेंट चढ़ा दिया, उसपर भारतीय जनता सरकार के साथ खड़ी है। क्योंकि लोगों को समझ आ रहा है कि इसका दूरगामी असर देश के लिए सुखद साबित होगा। फिर किस उद्देश्य की पूर्ति के

धर्मनिरपेक्षता की आड़ में मज़हबी तुष्टिकरण करना ही है कांग्रेस का मूल चरित्र

खुद को धर्मनिरपेक्षता की जननी बताने वाली कांग्रेस पार्टी के नेता और उत्तराखंड के मौजूदा मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मुस्लिम कर्मचारियों के लिये 90 मिनट का अवकाश तय किया है। ये अवकाश उन्हें नमाज़ अदा करने के लिये मिलेगा। इस विषय से संबंधित प्रस्ताव कैबिनेट में पास भी हो गया है। दरअसल कांग्रेस का यह चुनावी पैंतरा है, इससे ज्यादा कुछ नहीं है। जिस प्रांत में अराजकता, भ्रष्टाचार और लचर कानून

नये सेनाध्यक्ष की नियुक्ति का बेजा विरोध कर रहे विपक्षी दल

पिछले दिनों से एक खतरनाक राजनीतिक प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। यह प्रवृत्ति है भारतीय सेना को सियासत में खींचने की। अपनी सियासी चाल के लिए सेना के इस्तेमाल की। आज़ादी के बाद से हमारे देश में सेना सियासत से ऊपर रही है। जिस तरह से विदेश नीति को लेकर कमोबेश सभी दल एक धरातल पर रहते हैं, उसी तरह से सेना को लेकर भी सभी दलों में लगभग मतैक्य रहता आया है। लेकिन अब

राहुल गाँधी की राजनीतिक अपरिपक्वता की भेंट चढ़ती कांग्रेस

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का नाम ऐसे नेताओं के नाम मे सम्मिलित किया जाना चाहिए जो पार्टी के लिए करना तो बहुत कुछ चाहते हैं, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा कर देता है कि उनकी पार्टी को उनके कृत्यों पर न कुछ उगलते बनता और न ही कुछ निगलते बनता है। संसद का इस बार का शीतकालीन सत्र पिछले 15 वर्षों के इतिहास मे सबसे कम कामकाज वाले सत्र मे शामिल हो गया है। इस बार का पूरा

राहुल गाँधी का ये बड़बोलापन कहीं कांग्रेस के लिए ‘भूकंप’ न ले आये !

संसद का पूरा शीतकालीन सत्र नोटबंदी पर अपने फ़िज़ूल के हंगामे की भेंट चढ़ाने वाली कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने सत्र बीतते-बीतते अब एक नया बवाल खड़ा कर दिया है। गत 14 तारीख को एक प्रेसवार्ता में उन्होंने कहा कि उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत भ्रष्टाचार से जुड़ी जानकारी है, जिसे वे सार्वजनिक कर देंगे, इसलिए उन्हें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा। हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि

नोटबंदी का अतार्किक विरोध कर देश का भरोसा खोता विपक्ष

नोटबंदी के बाद जनता के मन में एक भावना आसानी से देखी जा सकती है कि प्रधानमंत्री के इस फैसले को वह हर तरह की परेशानी के बाद भी काला धन रखने वालों और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ देख रही है। और जनता की इस भावना ने दरअसल देश के विपक्ष के लिए कतार में लगी जनता से ज्यादा परेशानी की जमात खड़ी कर दी है।

धर्मांध शासक टीपू सुल्तान की जयंती मनाने की ये कैसी कांग्रेसी मजबूरी ?

एक धर्मांध, विस्तारवादी और बर्बर शासक टीपू सुल्तान की जयंती मनाने को लेकर कांग्रेसी उतावलापन उसके समुदाय विशेष के तुष्टिकरण कारनामों के पुलिंदे में एक नया आयाम जोड़ रहा है। वह भी ऐसे समय में जब स्वयं कर्नाटक हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि टीपू कोई स्वतंत्रता सेनानी नहीं था, वह महज एक शासक था जो अपने हितों के लिए लड़ा। समाज या देश के विकास में उसका कोई योगदान नहीं था। माननीय

‘वन रैंक वन पेंशन’ पर बोलने से पहले अपनी दादी और पापा की ‘करनी’ को तो जान लें, राहुल गाँधी!

वन रैंक वन पेंशन का मामला एकबार फिर गरमाया हुआ है। दरअसल गत दिनों एक पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल ने कथित तौर पर वन रैंक वन पेंशन की अनियमितताओं के कारण आत्महत्या कर ली। बस इसके बाद से ही इस मामले पर सियासी महकमे में सरगर्मी पैदा हो गई है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल तक तमाम नेता मृतक सैनिक के परिजनों से मिलने के नाम पर

भोपाल मुठभेड़ पर दिग्विजय सिंह के बड़बोले बयानों से सवालों के घेरे में कांग्रेस

एक कहावत है कि सत्य की अनदेखी वही करता है जिसे असत्य से लाभ हो। ऐसे ही एक सत्य की अनदेखी फिर देश के कतिपय सियासतदानों द्वारा की जा रही है जो जांच से पहले ही इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि भोपाल के केंद्रीय जेल से फरार प्रतिबंधित संगठन सिमी (स्टूडेंट इस्लामिक मुवमेंट ऑफ इंडिया) के आठ आतंकियों से पुलिस की हुई मुठभेड़ फर्जी है। हो सकता है कि मुठभेड़ के बाद का परिदृश्य

यूपी चुनाव : भाजपा के अलावा सभी दल राजनीतिक अस्थिरता का शिकार

उत्तर प्रदेश चुनाव को देखते हुए सभी राजनीतिक पार्टियॉ अपने-अपने तरीके से जोड़-तोड़ की राजनीति में लग गई है। प्रशात किशोर की रणनीति भी कांग्रेस के लिए सफल नही हो पा रही है। जिस सियासत को साधने के लिए कांग्रेस ने यूपी की बहू को दिल्ली से लेकर आई, उसी की वजह से रीता बहुगुणा जोशी कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन पकड़ चुकी है। जिस 27 साल के सूखे को खत्म करने के लिए प्रशांत किशोर ने