मोदी सरकार को अर्थनीति सिखाने से पहले ज़रा अपनी गिरेबान में तो झाँक लीजिये, मनमोहन सिंह जी!

पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह जी, संसद में आपकी इस तकरीर कि नोटबंदी संगठित और कानूनी लूट-खसोट है और इस फैसले से देश के किसानों और उद्योगों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा, ने कुल मिलाकर देश को हंसते-हंसते लोटपोट हो जाने का ही मौका दिया है। आपका यह प्रवचन ठीक उसी प्रकार है, जैसे कोई रोगी वैद्य किसी मरीज को बेहतर दवाओं का नुस्खा बताता है। आपको भान होना चाहिए कि स्वयं आपकी और आपके नेतृत्ववाली यूपीए सरकार दोनों का इतिहासपरक मूल्यांकन हो चुका है और आपकी सरकार आजाद भारत के सबसे भ्रष्टतम सरकारों में शुमार है। आप ही नहीं, बल्कि आपके महान अर्थशास्त्री होने की आत्ममुग्धता के शिकार पैरोकारों को भी नहीं भूलना चाहिए कि आपकी नेतृत्ववाली यूपीए सरकार न केवल देश में बल्कि दुनिया भर में बदनाम रही है। उस दौरान अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट ने आपको नाकामयाब और असहाय प्रधानमंत्री करार देते हुए आपकी सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार कहा था। तब आपके खैरख्वाहों ने लाल-पीले होते हुए अखबार को नसीहत दिया था कि वह माफी मांगे। यही नहीं, दुनिया की जानी-मानी अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने भी आपको फिसड्डी प्रधानमंत्री के तमगे से नवाजा था। उसने मैन इन शैडो शीर्षक से प्रकाशित अपने लेख में देश की आर्थिक वृद्धि में सुस्ती, भारी वित्तीय घाटा और रुपए की कमजोर स्थिति के लिए आपकी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था।

देश जानना चाहता है कि अगर आप इतने ही महान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री थे, तो आपकी सरकार अर्थव्यवस्था को रसातल में जाने से क्यों नहीं रोक पायी ? क्या कारण रहा कि विदेशी निवेशक बाजार से भाग खड़े हुए और आप देखते रह गए ? क्या कारण रहा कि ढांचागत परियोजनाओं पर आपकी सरकार कोई ठोस निर्णय लेने में विफल रही और कल-कारखानों एवं उद्योग-धंधों के पहिए जाम हो गए ? देश जानना चाहता है कि कि आप जैसे महान अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री होने के बाद भी आर्थिक सुस्ती का माहौल क्यों बना रहा ? लेकिन तमाशा है कि आप अपनी बदनाम सरकार की काली कारस्तानी पर अफसोस जताने और देश से माफी मांगने के बजाए मौजूदा मोदी सरकार पर सवाल दाग रहे हैं जो कि देश को कालेधन से मुक्त कराने के लिए प्रयासरत है।

क्या उचित नहीं होता कि आप मौजूदा सरकार पर सख्त टिप्पणी के बजाए नोटबंदी के फैसले के असर का थोड़ा इंतजार कर लेते ? पानी को उबलने के लिए भी 100 डिग्री तापमान का इंतजार करना होता है। फिर आप इतने अधीर क्यों हो गए ? कहीं ऐसा तो नहीं कि कांग्रेस पार्टी ने आपको मुंह खोलने के लिए विवश किया और आपने मोदी सरकार को भला-बुरा कह अपना फर्ज निभा दिया ? यह आशंका इसलिए कि दस जनपथ से नियंत्रित होने का आरोप आप पर कई बार लग चुका है। बहरहाल, कांग्रेस पार्टी ने आपसे मोदी सरकार पर हमला बुलवाकर खुद आपको कठघरे में खड़ा कर दिया है। देश आपसे पुनः पूछ रहा है कि आपके नाक के नीचे ही ठगों की टोली देश को लूटती रही और आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे।

आखिर क्यों ? बेहतर होगा कि आप देश को बताएं कि भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की ? देश जानना चाहता है कि अगर आप इतने ही महान अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री थे, तो आपकी सरकार अर्थव्यवस्था को रसातल में जाने से क्यों नहीं रोक पायी ? क्या कारण रहा कि विदेशी निवेशक बाजार से भाग खड़े हुए और आप देखते रह गए ? क्या कारण रहा कि ढांचागत परियोजनाओं पर आपकी सरकार कोई ठोस निर्णय लेने में विफल रही और कल-कारखानों एवं उद्योग-धंधों के पहिए जाम हो गए ? देश जानना चाहता है कि कि आप जैसे महान अर्थशास्त्री के प्रधानमंत्री होने के बाद भी आर्थिक सुस्ती का माहौल क्यों बना रहा ? क्या यह सच नहीं है कि तब के वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे कौशिक बसु ने अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान वाशिंगटन की संस्था ‘कार्नेगी एंडाओमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ में कहा था कि भारत में आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी है और इसके लिए आपकी सरकार जिम्मेदार है ? क्या यह सच नहीं है कि अमेरिका के प्रमुख अखबार ‘ह्यवॉल स्ट्रीट’ ने भारत के जीडीपी ग्रोथ रेट में कमी, रुपए की कीमतों में गिरावट और स्टॉक मार्केट की दुर्दशा के लिए आपकी नीति को जिम्मेदार ठहराया था ?

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क्या यह सच नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी स्टैण्डर्ड एवं पुअर्स (एसएंडपी) ने उनकी सरकार को चेतावनी दिया था कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं आती है, तो वह देश की रेटिंग को निवेश ग्रेड से घटाकर सीसी यानी खराब कर देगी ? क्या यह सच नहीं है कि अमेरिकी उद्योग चैंबर ने आपकी सरकार की नीतिगत निष्क्रियता की जमकर आलोचना की थी ? क्या देश के जाने-माने उद्योगपति रतन टाटा ने एक ब्रिटिश अखबार को दिए गए अपने इंटरव्यू में नहीं कहा था कि भारत के कारोबारी माहौल में घूसखोरी का बोलबाला है, जिसकी वजह से निवेश का माहौल नहीं बन पा रहा है ? क्या यह सच नहीं है कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के पद पर पी जे थॉमस की नियुक्ति प्रकरण ने आपकी और आपकी यूपीए सरकार की साख चौपट कर दी? क्या सच नहीं है कि इसके लिए आपको न्यायालय से फटकार खानी पड़ी और देश से माफी मांगना पड़ा ? क्या यह सच नहीं है कि न केवल आपके मंत्रियों बल्कि स्वयं आप पर भी गंभीर आरोप लगे ? क्या यह सच नहीं है कि 2004 से 2009 के बीच जब कोयला ब्लॉकों का आवंटन हुआ तब कोयला मंत्रालय का प्रभार आपके हाथ में था? क्या पूर्व कोयला सचिव पीसी पारख के बयान से स्पष्ट नहीं हुआ कि कोयला खदानों के आवंटन में हुई अनियमितता के लिए आप भी जिम्मेदार रहे ? क्या यह सच नहीं है कि कोयला आवंटन घोटाले मामले में स्टेट्स रिपोर्ट को बदला गया ? क्या इस कारस्तानी से रेखांकित नहीं हुआ कि एक केंद्रीय सत्ता खुद के भ्रष्टाचार की जांच में लीपापोती करने के प्रयास में रंगे हाथ पकड़ी गयी और न्यायालय से फटकार खायी ?

क्या यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार का खुलासा करते हुए विकिलीक्स ने दावा नहीं किया था कि 2008 में परमाणु करार के मसले पर वाम दलों द्वारा आपकी सरकार से समर्थन लिए जाने के बाद विश्वास मत के दौरान आपकी सरकार को बचाने के लिए सांसदों को रिश्वत दी गयी थी और इसकी सूचना अमेरिकी सरकार को वाशिंगटन तक भेजी गयी ? क्या विकिलीक्स वेबसाइट ने यह दावा नहीं किया था कि कांग्रेसी सांसद सतीश शर्मा के सहयोगी नचिकेता कपूर ने अमेरिकी दूतावास के एक कर्मचारी को नोटों से भरे दो बक्से दिखाए थे और कहा कि भारत अमेरिकी परमाणु सौदे को लेकर आपकी  सरकार के विश्वासमत हासिल करने के लिए 50-60 करोड़ रुपए तैयार रखे हैं ? लेकिन तमाशा है कि आप अपनी बदनाम सरकार की काली कारस्तानी पर अफसोस जताने और देश से माफी मांगने के बजाए मौजूदा मोदी सरकार पर सवाल दाग रहे हैं जो कि देश को कालेधन से मुक्त कराने के लिए प्रयासरत है। पूर्व प्रधानमंत्री जी, बेहतर होगा कि आप आईने से पीठ सटाकर बात कहने के बजाए आईने के सामने खड़े होइए। उसके बाद मौजूदा सरकार पर आरोप लगाने का नैतिक साहस शायद ही आप जुटा सकें।

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)