वामपंथी

नेतन्याहू भारत आए तो वामपंथियों के सीने पर सांप क्यों लोटने लगा !

विदेश नीति का मुख्य तत्व राष्ट्रीय हित होता है। अन्य तत्वों में बदलाव हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय हित की कभी अवहेलना नहीं होनी चाहिए। इजरायल के साथ भारत की दोस्ती राष्ट्रीय हित के अनुरूप है। ऐसे में, यह अनुचित है कि भारत के कुछ विपक्षी राजनीतिक दलों और नेताओं ने इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की यात्रा का विरोध किया या उनसे मिलने के तरीके पर हल्की टिप्पणी की। ऐसा करने वाले नेताओं को

जनरक्षा यात्रा : कम्युनिस्ट हिंसा को भाजपा का लोकतान्त्रिक जवाब

इसमें दो राय नहीं है कि राजनीति मौजूदा समाज का दर्पण है। समाज के प्रचलित मूल्‍य राजनीति में भी झलकते हैं। जहां तक वर्तमान राजनीति की बात है, यह उस दौर से गुजर रही है जो पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसा प्रतीत होता है मानो भाजपा सरकार की सफलता से भयाक्रांत होकर सारे विपक्षी दल लामबंद होकर नफरत एवं हिंसा के सतही हथकंडों पर उतर आए हैं।

शांतनु की हत्या पर गौरी लंकेश की हत्या जैसा ‘शोर’ क्यों नहीं है ?

पिछले दिनों तथाकथित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्‍या हुई, जिसकी खबरें लगातार सुर्खियों में बनी रहीं। मीडिया में लंकेश की हत्‍या से अधिक चर्चा हत्‍या को लेकर मची राजनीति पर हुई। यह शोर अभी थमा नहीं था कि बीते बीस सितम्बर को एक और पत्रकार की हत्‍या की खबर सामने आई। त्रिपुरा में एक टीवी पत्रकार शांतनु भौमिक की उस वक्‍त हत्‍या कर दी गई जब वे मंडई इलाके में दो राजनीतिक दलों के बीच मचे घमासान

प्रेस क्लब में गौरी लंकेश की हत्या पर शोक जताने की नहीं, मोदी विरोध की सभा थी !

हत्या एक जघन्य अपराध है, इसका कड़ा विरोध होना चाहिए; फिर वो चाहे कोई हो, किसी भी विचारधारा का हो, आपसे सहमत हो, ना हो और आपका धुर विरोधी ही क्यूं ना हो। पर, कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू में खौफनाक ढंग से हुई गौरी लंकेश की हत्या के बाद जिस अंदाज में राजधानी दिल्ली से लेकर देश भर में एक माहौल बनाने की कोशिश की गई, उससे एक बार फिर असहिष्णुता का मुद्दा बनाकर अवार्ड वापसी

गौरी लंकेश की हत्या पर कर्नाटक सरकार से सवाल पूछने से क्यों बच रहे, कॉमरेड ?

कर्नाटक जैसा देश का एक शानदार और प्रगतिशील राज्य जिस तेजी से गर्त में मिल रहा है, उसे सारे देश को गंभीरता से लेना होगा। बैंगलुरू में वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की उनके घर में घुसकर हत्या से सारा देश का मीडिया जगत सन्न है। वो जुझारू पत्रकार थीं। गौरी के कातिलों को पकड़ा जाए और उन्हें कड़ी से कड़ी सजा मिले।

‘भारत छोड़ो आंदोलन में पूरा देश अंग्रेजों को खदेड़ने में जुटा था और वामपंथी उनके साथ खड़े थे’

जो वामपंथी आज राष्‍ट्रवाद का लबादा ओढ़कर राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ जैसे राष्‍ट्रवादी संगठन को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं, उन वामपंथियों की सोच राष्‍ट्रीय भावनाओं से अलग ही नहीं एकदम विपरीत रही है। भारतीय इतिहास वामपंथियों की राष्‍ट्रविरोधी कथनी-करनी के उदाहरणों से भरा पड़ा है। देश की आज़ादी की लड़ाई के दौरान उस लड़ाई को कमजोर करने की वामपंथियों द्वारा भरसक कोशिश की गयी। दूसरे शब्दों में कहें

हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम में बदलाव की जरूरत

सन् 1990 ई. में हिंदी में औपचारिक नामांकन हुआ. बी.ए, एम.ए, एम.फिल, पीएच. डी. फिर अध्यापन। समय बदला, देश का मिजाज बदला, पर हिंदी के विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम का स्वर नहीं बदला। वही प्रलेस, जलेस-मार्का कार्यकर्ता-अध्यापक लोग, वही पात्रों के वर्ग-चरित्र की व्याख्याएँ, वही द्वन्द्व खोजने की वृत्ति बनी रही। बदलने के नाम पर यौनिकता, लैंगिकता, स्त्री-देह और जातिवाद पर शोध करने को बढ़ावा देने की वृत्ति बढ़ी।

सूर्यास्त की ओर बढ़ती वामपंथी राजनीति

हर मुद्दे पर सिद्धांतवादी राजनीति का ढिंढोरा पीटने वाली वामपंथी राजनीति की असलियत उजागर करने वाले उदाहरणों की कमी नहीं है। ताजा मामला केरल की भारतीय कम्‍युनिस्‍ट पार्टी (सीपीआई) नेता एमएस गीता गोपी की बेटी की शादी का है, जिसमें सोने के गहनों से लदी उनकी बेटी की तस्‍वीर चर्चा का विषय बनी। क्‍या इतनी वैभवपूर्ण शादी सिद्धांतवादी राजनीति करने वाली पार्टी का कोई नेता बिना भ्रष्‍टाचार किए कर लेगा?

भारतीय सेना पर लांछन लगा पाकिस्तान की लाइन को आगे बढ़ाते रहे हैं वामपंथी !

भारतीय सेना सदैव से कम्युनिस्टों के निशाने पर रही है। सेना का अपमान करना और उसकी छवि खराब करना, इनका एक प्रमुख एजेंडा है। यह पहली बार नहीं है, जब एक कम्युनिस्ट लेखक ने भारतीय सेना के विरुद्ध लेख लिखा हो। पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट लेखक पार्थ चटर्जी ने सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत की तुलना हत्यारे अंग्रेज जनरल डायर से करके सिर्फ सेना का ही अपमान नहीं किया है, बल्कि अपनी संकीर्ण

कन्नूर में यूथ कांग्रेस के लोगों ने जो किया, वैसी हरकतें कांग्रेस की बची-खुची लुटिया भी डुबो देंगी!

केरल के कन्नूर में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा गाय काटने की घटना निहायत घटिया, शर्मनाक और शैतानी हरकत है। इसे देश में गाय के नाम पर माहौल को बिगाड़ने की साज़िश माना जाना चाहिए। ऐसे लोगों को सख़्त सज़ा मिलनी चाहिए। यह मत भूलिए कि केरल के कन्नूर जिले में लगातार भाजपा और संघ कार्यकर्ताओं की हत्याएं भी हो रही हैं।