शैलेन्द्र कुमार शुक्ला

वहाबी कट्टरपंथ को नकारें भारतीय मुसलमान

विभाजन के बाद देश ने कई विभीषिकाओं को झेला, हजारों आपदाओं को सहन किया। फिर…

तय कीजिये आतंक का मज़हब, वर्ना ये आपका मजहब तय कर देगा

मेरे एक मुस्लिम मित्र थे, जिनसे पहली बार 2012 में मुलाकात हुई थी। प्रथमद्रष्टया स्वभाव के अच्छे लगे, अतः उनसे आत्मीयता भी बढ़ गयी, लेकिन उनका भोलापन और मृदुभाषी होना महज एक दिखावा था। इस बात का आभास मुझे उस समय हुआ जब हम लोग बाटला हाउस एनकाउंटर पर चर्चा कर रहे थे।

वामपंथियों का चर्च प्रेम: झूठी रिपोर्ट्स दिखाकर बदलते हैं ‘पब्लिक परसेप्शन’

जून 2016 में आल इंडिया पीपुल्स फोरम की 8 सदस्यीय टीम ने छत्तीसगढ़ के चार जिलों बस्तर ,दंतेवाड़ा ,सुकमा ,बीजापुर का एक दौरा कर एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट तैयार की। ईसाई मिशनरी फंडेड इस वामपंथी संगठन की अगुवाई अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन कर रही थीं।

अराजकता का ध्वस्त होता अधिकारवाद, केजरीवाल को कोर्ट का तमाचा

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को संवैधानिक मर्यादाओं के विधिक विवेचन और स्थापन के बीच अधिकारों की ‘जंग’ में दिल्ली हाईकोर्ट से वाजिब सबक मिलने के साथ ही बड़ा सियासी झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने आज केजरीवाल सरकार की याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट रूप से कहा है कि उपराज्यपाल ही दिल्ली के संवैधानिक प्रमुख हैं और वह कैबिनेट की सलाह मानने को बाध्य नहीं हैं। दरअसल आज दिल्ली हाईकोर्ट के सामने प्रश्न था कि दिल्ली पर किसका कितना अधिकार है यानी दिल्ली सरकार का या फिर उपराज्यपाल का।

वामपंथी जमात की धमकियों को दरकिनार कर कार्यक्रम में गये नामवर सिंह

हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह नब्बे साल के हो गए और दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में दिनभर एक समारोह का आयोजन किया गया। इस समारोह में गृह मंत्री राजनाथ सिंह और संस्कृति मंत्री महेश शर्मा के अलावा पूरे देशभर के कई अहम साहित्यकारों ने शिरकत की। इंदिरा गांधी कला केंद्र द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम को लेकर प्रगतिशील लेखकों के पेट में दर्द शुरू हो गया था।

समाज के लिए आज भी अभिशाप है ‘ऑनर किलिंग’

‘ऑनर किलिंग’ किसी तथाकथित गौरव के लिए की गई वो हत्याएं हैं जिसका सामना ज्यादातर महिलाओं को करना पड़ता है। इनकी पहचान कर पाना बहुत मुश्किल काम होता है, क्योंकि कई बार संपत्ति के मामलों में भी हत्याएं ऐसे ही बहाने बना कर की जाती हैं इसलिए अगर किसी समाज में इनकी गिनती ढूँढने की कोशिश करें को मुश्किल होगी।

जन-समस्याओं के समाधान के लिए मोदी सरकार की ट्विटर सेवा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुरू से ही तकनीकी का इस्तेमाल करते रहें है खास कर सोशल मीडिया पर उन्होंने ज्यादा जोर दिया है। यही नहीं मोदी अपने मंत्रीमंडल के सभी मंत्रियो को भी सोशल मीडिया पर लोगों की शिकायत सुनने और उसे दूर करने की सलाह देते रहें है। समय के साथ–साथ मोदी कुछ नए प्रयोग भी करतें रहते है।

अपनी हरकतों से अन्तर्राष्ट्रीय  मंच पर बेनकाब होता पाकिस्तान  

पाकिस्तान की संवैधानिक संस्थाओं ने जिस प्रकार एक आतंकी सरगना की मौत पर काला दिवस मनाया, उसके बाद उससे सकारात्मक सहयोग की आखिरी उम्मीद भी समाप्त हो गयी। पिछले दिनों भारतीय सैनिकों ने एक आतंकी सरगना को कश्मीर में मार गिराया था। इसके पहले पाकिस्तान विश्वमंच पर अपने को भी आतंकवाद से पीड़ित बताता रहा है। बात एक हद तक सही भी है। आतंकवाद उसके लिए अब भस्मासुर बन गया है। ऐसे में उससे यह उम्मीद थी कि वह आतंकी के खात्मे पर खामोश ही रह जाता। तब माना जाता कि वह भी पीड़ित है। लेकिन उसने अपने को खुद ही बेनकाब कर दिया।

तथाकथित सेक्युलर मीडिया को पत्रकार रोहित सरदाना का करारा जवाब

किले दरक रहे हैं। तनाव बढ़ रहा है। पहले तनाव टीवी की रिपोर्टों तक सीमित रहता था। फिर एंकरिंग में संपादकीय घोल देने तक आ पहुंचा। जब उतने में भी बात नहीं बनी तो ट्विटर, फेसबुक, ब्लॉग, अखबार, हैंगआउट – जिसकी जहां तक पहुंच है, वो वहां तक जा कर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करने लगा।जब मठाधीशी टूटती है, तो वही होता है जो आज भारतीय टेलीविज़न में हो रहा है। कभी सेंसरशिप के खिलाफ़ नारा लगाने वाले कथित पत्रकार – एक दूसरे के खिलाफ़ तलवारें निकाल के तभी खड़े हुए हैं जब अपने अपने गढ़ बिखरते दिखने लगे हैं। क्यों कि उन्हें लगता था कि ये देश केवल वही और उतना ही सोचेगा और सोच सकता है – जितना वो चाहते और तय कर देते हैं। लेकिन ये क्या ? लोग तो किसी और की कही बातों पर भी ध्यान देने लगे।

‘मन की बात’ से बढ़ी रियो ओलंपिक में पदक जीतने की उम्मीद  

विगत कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब ‘मन की बात’ में भारतीय खेलों को बेहतर बनाने की बात कही तो भारतीय खेल और खिलाड़ियों के साथ-साथ  देशवासियों को उम्मीद की एक नयी किरण दिखाई दी। दरअसल यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पूरे देश को मिलकर विचार करना पड़ेगा यह केवल अकेले सरकार का मसला नहीं है। हर बार जब देश के खिलाड़ी पदक जितने में कामयाब नहीं होते हैं अथवा इक्के-दुक्के होते हैं तो देश भर में एक चर्चा आम हो जाती है कि आखिर इतनी बड़ी आबादी में से नाम मात्र के खीलाड़ी ही पदक क्यों जीतते हैं?। लेकिन कभी भी किसी भी स्तर पर इसके समाधान के बारे नहीं सोचा गया।