जेडीएस से गठबंधन करके कांग्रेस ने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है !

भारतीय जनता पार्टी की सरकार, विशेषकर नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की मजबूरी के तहत बनने जा रही कांग्रेस-जनता दल (एस) सरकार कितनी टिकाऊ साबित होगी, यह तो आने वाला वक्‍त ही बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि ये गठबंधन करके कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार ली है।

कर्नाटक के घटनाक्रमों से एक बार फिर साबित हो गया कि कांग्रेस के लिए सत्‍ता साधन न होकर साध्‍य है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार, विशेषकर नरेंद्र मोदी के विजय रथ को रोकने की मजबूरी के तहत बनने जा रही कांग्रेस-जनता दल (एस) सरकार कितनी टिकाऊ साबित होगी, यह तो आने वाला वक्‍त ही बताएगा, लेकिन इतना तो तय है कि ये गठबंधन करके कांग्रेस ने कर्नाटक में अपने पैरों पर कुल्‍हाड़ी मार लिया है।

कांग्रेस की सोच यह है कि जब वह सूबे में मजबूत स्‍थिति में आ जाएगी, तब गठबंधन तोड़कर अपने दम पर जनता की अदालत (चुनाव) में जाएगी। इसी रणनीति के तहत कांग्रेस और जनता दल (एस) के बीच दिल्‍ली में मलाईदार मंत्रालयों के लिए बैठकों का दौर जारी है। यहां सबसे अहम सवाल यह है कि क्‍या जनता दल (एस) कांग्रेस को मजबूत बनने देगी। हरगिज नहीं, क्‍योंकि वह जानती है कि 78 विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी कभी नहीं चाहेगी कि 38 विधायकों वाली पार्टी का नेता मुख्‍यमंत्री बने।

स्‍पष्‍ट है कि कांग्रेस का खुद को मजबूत बनाने का मंसूबा शायद ही पूरा हो। इतिहास गवाह है कि जहां-जहां 133 साल पुरानी कांग्रेस पार्टी ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया, वहां-वहां वह सदा के लिए हाशिए पर चली गई। इसके समानांतर भाजपा तथा क्षेत्रीय पार्टियों के प्रदर्शन में सुधार हुआ।

इसकी असली वजह यह है कि कांग्रेस पार्टी सत्‍ता को साधन नहीं, साध्‍य मानती है और सत्‍ता पाने के लिए आत्‍मघाती गठबंधन करने से गुरेज नहीं करती है। उदाहरण के लिए पश्‍चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उसने वामंपथियों पार्टियों के साथ गठबंधन किया, तो केरल विधान सभा चुनाव में उनके खिलाफ लड़ी। इसलिए जनता के बीच उसकी लोकप्रियता घटी।

कांग्रेस ने इसी तरह का आत्‍मघाती कदम उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उठाया। उत्‍तर प्रदेश में कांग्रेस  ने तकरीबन साल भर 27 साल यूपी बेहाल” नामक अभियान चलाया, लेकिन चुनाव के ठीक पहले उसी समाजवादी पार्टी से चुनावी गठबंधन कर लिया जिसे वह उत्‍तर प्रदेश की बेहाली के लिए जिम्‍मेदार मानती थी।  इससे कांग्रेस की वैचारिक प्रतिबद्धता में गिरावट आई।

इसीका नतीजा है कि कभी देश के हर गांव-कस्‍बा-तहसील से नुमाइंगी दर्ज कराने वाली पार्टी लगातार सिकुड़ती जा रही है। दूसरी महत्‍वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस ने जब भी अपना मत प्रतिशत किसी के हाथ गंवाया वह दुबारा हासिल नहीं कर पाई। इसके बावजूद कांग्रेस परिवारवाद से आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसी परिवारवाद ने योग्‍यता और आंतरिक लोकतंत्र का अपहरण कर रखा है, जिसका नतीजा लगातार हार के रूप में सामने आ रहा है।

राहुल गांधी की लांचिंग की तैयारियों के बीच कांग्रेस को 2012 में उत्‍तर प्रदेश और पंजाब में हार मिली, तो 2014 के लोकसभा चुनाव में वह सिर्फ 44 सीटों तक सिमट गई। 2014 में ही महाराष्‍ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्‍मू-कश्‍मीर में भी करारी हार मिली। 2015 में दिल्‍ली में विधानसभा चुनावों में महज कुछ साल पुरानी पार्टी ने उसे बुरी तरह हराया और उसके वोट प्रतिशत में भारी-भरकम गिरावट आई। इसी तरह 2016 में असम के साथ केरल और पश्‍चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। 2017 में गुजरात, हिमाचल प्रदेश के साथ उत्‍तर प्रदेश और उत्‍तराखंड में कांग्रेस को भारी हार का सामना करना पड़ा।

जिस पंजाब को कांग्रेसी अपनी उपलब्‍धि बताते हैं, वह राहुल गांधी की राजनीतिक सूझ-बूझ का नहीं, कैप्‍टन अमरिंदर सिंह की मेहनत का नतीजा है। यही कारण है कि कांग्रेस की जीत का सिलसिला पंजाब से आगे नहीं बढ़ पाया। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। दिसंबर, 2017 में कांग्रेस का अध्‍यक्ष बनने के बाद 2018 में त्रिपुरा, नागालैंड ओर मेघालय में हुए चुनावों में भी कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ा और अब कर्नाटक में भी सत्ता गंवाकर वह दूसरे नंबर की पार्टी बन गई।

स्‍पष्‍ट है, लगातार मिल हार से कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी के विरूद्ध विरोध की आवाज न उठे इसे दबाने के लिए ही कांग्रेस अपना सब कुछ दांव पर लगाकर कर्नाटक में एच. डी. कुमारस्‍वामी को मुख्‍यमंत्री बनने दे रही है। इससे राहुल गांधी के विरूद्ध विरोध की आवाज भले दब जाए, लेकिन कांग्रेस की सत्‍ता में वापसी होगी, यह कहना मुश्‍किल है; क्‍योंकि गठबंधन के जरिए राजनीतिक जमीन गंवाने का कांग्रेस का लंबा इतिहास रहा है। इसके बावजूद कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी अपनी कमियों को दूर न कर 2019 में प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं, तो इसे मुंगेरी लाल के हसीन सपने ही कहा जाएगा।

(लेखक केन्द्रीय सचिवालय में अधिकारी हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)