कश्मीर

वहाबी कट्टरपंथ को नकारें भारतीय मुसलमान

विभाजन के बाद देश ने कई विभीषिकाओं को झेला, हजारों आपदाओं को सहन किया। फिर…

मोदी के बयान के बाद फिर बोला बलूचिस्तान, ‘हम लेके रहेंगे आजादी!’

एक भारतीय के नाते खबरिया चैनल पर इस तरह की बहस सुनने का यह पहला अनुभव था। जिसमें पाकिस्तान पैनलिस्ट सफकात सईद को बलूचिस्तानी पैनलिस्ट तारिक फतह कहते हैं- ‘‘तुम अपने पूर्वजो को भूल सकते हो। मैं नही भूल सकता। इस नाते मैं हिन्दूस्तानी हूं। तुम पाकिस्तानी भी हिन्दूस्तानी हो। अफगानी भी हिन्दूस्तानी हैं। बलूचिस्तानी भी हिन्दूस्तानी है।’’

शाह फैजल के किन्तु-परन्तु में भारत और कश्मीर कहां है?

2009 के आईएएस टॉपर शाह फैजल के दर्द भरे लेख को पढ़ लेने वाले देश के अधिकांश लोगों के मन में ये अहसास गहरा सकता है कि दरअसल भारत सरकार ने कश्मीर के साथ संवाद का गलत तरीका अपनाया है। शाह फैजल ने अपने लेख में लगातार बताया है कि गलत तरीके से हो रहे संवाद से कश्मीर लगातार भारत से दूर होता जा रहा है। शाह का लेख दरअसल एक कश्मीरी की भावनाओं को सामने लाता है। लेकिन, ये भावनाओं से ज्यादा उस डर को ज्यादा सामने लाता है, जिसमें कश्मीर के आतंकवाद, अलगाववाद के खिलाफ बोलने से हर कश्मीरी की जिंदगी जाने का खतरा है

काश्मीर: विलासितों के लोकतंत्र से बढ़ता आतंकवाद का खतरा

वर्तमान समय काश्मीर के सन्दर्भ में जो बुद्धिजीवी यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि काश्मीर में उत्पात मचा रहे अलगाववादी ताकतों से शांति और सद्भावना से शान्ति एवं सद्भावना की उम्मीद की जानी चाहिए, वह या तो झूठ बोलते है या फिर वह स्वयं किसी यूटोपिया में जी रहे हैं। अलगाववादी पत्थरबाजों से शान्ति की अपील इसलिए भी असंभव लगती है क्योंकि वे पिछले 69 सालो से शेष भारत से अलग और विशेष होने की विलासता में जीवन जी रहे हैं और उनको वैसे ही जीते रखने की कोशिश भी तथाकथित सेक्युलर सरकारों द्वारा की गयी है।

जाकिर नाइक के चैनल के नक्शे में ‘काश्मीर’ नहीं है भारत का हिस्सा!

बांग्लादेश में हुए हमले के बाद किसको फायदा और किसको नुकसान हुआ इसका विश्लेषण तो होता ही रहेगा, लेकिन भारत में इसका फायदा यह हुआ कि इस्लाम मज़हब के प्रचारक ज़ाकिर नाइक को ले कर भारतीयों की नींद अब टूटी है और उनके क्रिया-कलापो की विवेचना शुरू हो गयी है।